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माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैंने उनकी अनुमति ले ली है। सभापति इसे
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पेश करने से पहले या बाद में अपनी अनुमति दे सकते हैं।
यह मामला अनुदानों के प्रति निर्देश करता है और मूल अनुच्छेद में ही यह उपबंध है कि तीन वर्ष का औसत असम को दिया जाना चिहए। हमसे यह अभ्यावेदन किया गया था कि यदि तीन वर्ष का औसत लिया जाए तो असम सरकार को बहुत थोड़ा मिलेगा क्योंकि पहले वर्ष में उन्होंने कुछ भी खर्च नहीं किया था किन्तु यदि हम दो वर्ष का औसत लें तो उन्हें ज्यादा मिलेगा। इसी कठिनाई को दूर करने के लिए प्रारूपण समिति ने तीन वर्ष के बजाय दो वर्ष शब्द समाविष्ट किए हैं।
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बम्बई : साधारण) : माननीय सभापति महोदय,
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मैं तुरन्त यह कह सकता हूँ कि मैं अपने मित्र श्री निकोल्स राय द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार करने को तैयार हूँ। इस अनुच्छेद के प्रारूप से ऐसी धारणा उत्पन्न होती प्रतीत होती है कि जब तक संसद हर वर्ष यह तय न करे कि अनुदान क्या होंगे तब तक राष्ट्रपति को ऐसा करने की शक्ति नहीं होगी। निश्चय ही प्रारूपण समिति का यह आशय नहीं था। प्रारूपण समिति चाहेगी कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 255 के अधीन अनुदान देने की अपनी शक्तियों का प्रयोग संसद द्वारा इस विषय के अवधारण से भी पूर्व करे। इस स्थिति को सर्वथा स्पष्ट करने के लिए जैसाकि मैंने पूर्व में कहा था, मैं श्री निकोल्स राय द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार करने को तैयार हूॅ। फिर भी इस प्रक्रम पर मैं यह कहना चाहूँगा कि मुझे अभी तक उनके द्वारा संशाधन में प्रयुक्त भाषा को जांचने-परखने का पर्याप्त समय नहीं मिला है। अतः उस बात के अधीन रहते हुए कि प्रारूपण समिति को अनुच्छेद 255 में यथा विद्यमान पाठ के अनुरुप भाषा को बदलने की आजादी होगी, मैं उनके संशोधन को स्वीकार करने को तैयार हूँ।
माननीय सभापति : अब मैं संशोधन को मतदान के लिए रखता हूँ।
[ डॉ. भीमराव अम्बेडकर के पूर्वोक्त सभी संशोधन अंगीकृत हुए। ]
माननीय सभापति : अब मैं परमपूज्य निकोल्स राय का संशोधन रखता हूँ।
प्रश्न है -
“कि अनुच्छेद 255 में :
(क) “संसद विधि द्वारा उपबंध कर सकेगी” शब्दों के पश्चात् ‘अथवा जब तक कि संसद इस प्रकार उपबंध न करे जैसा राष्ट्रपति द्वारा विहित किया जाए’ शब्द अन्तः स्थापित किए जाएं;
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 9 अगस्त, 1949, पृ. 293-94