अनुच्छेद 256 - Page 94

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सं. 89 और 90 हैं। वह इन्हें प्रस्तावित नहीं कर रहे हैं। इसके बाद डॉ. अम्बेडकर के नाम में सं. 91 है।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं इसे प्रस्तावित करना नहीं चाहता

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हूँ।

* * * *

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं नहीं समझता कि कोई विस्तृत

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जवाब देने की जरूरत है। स्थिति बिल्कुल सरल है कि हर संविधान में राज्य के कराधान संसाधन साधारणतया केन्द्र और राज्यों के बीच वितरित किये जाते हैं। राज्यों और स्थानीय प्राधिकरणों के बीच संसाधनों के वितरण का प्रश्न राज्य पर विधि द्वारा निपटाये जाने के लिए छोड़ा जाता है, क्यांकि स्थानीय प्राधिकरण कोरी राज्य की सृष्टि होती है। उसके पास कोई आर्थिक अधिकारिता नहीं होती, उसकी रचना कुछ प्रयोजनों के लिए की जाती है; यदि उन प्रयोजनों का ठीक से पालन न किया जाएं तो उन्हें राज्य द्वारा हटाया जा सकता है। मेरे द्वारा प्रस्तावित यह अनुच्छेद वास्तव में इस सामान्य नियम का अपवाद है कि स्थानीय प्राधिकरण नामक राज्य की अधीनस्थ संस्था के वित्तीय संसाधनों के विषय में संविधान में कोई उपबंध नहीं होना चाहिए। लेकिन इस बात को ध्यान में रखते हुए कि वर्तमान में कुछ स्थानीय प्राधिकरण हैं और उनका प्रशासन कुछ करों पर निर्भर करता है जो वे उगाह रहे हैं और यद्यपि वे कर आयकर विधि की भावना के प्रतिकूल हैं फिर भी प्रारूपण समिति वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, वर्तमान वस्तु-स्थिति को जारी रखने देने के लिए तैयार है। वस्तुतः अपवाद उस सीमा तक था जो विशेषज्ञ समिति द्वारा नियत की गई थी। वह सीमा 250/- रुपये थी। प्रस्ताव है कि इसे घटाकर 150/- रुपये कर दिया जाना चाहिए। प्रारूपण समिति ने पुनर्विचार करके तय किया कि यह करने की जरूरत नहीं है तथा वर्तमान वस्त-ुस्थिति में यह सीमा जारी रह सकती है और उस विस्तार क्षेत्र के भीतर जारी रह सकती है जो आज है। इसलिए मैं इसके निश्चित रूप से खिलाफ हूँ और इसीलिए मैं ऐसे किसी संशोधन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हूँ जो मेरे किसी भी माननीय मित्र द्वारा प्रस्तावित किया जाए।

[ इससे पूर्व दिया गया डॉ. अम्बेडकर का संशोधन अंगीकृत हुआ और यथासंशोधित अनुच्छेद 256 संविधान में जोड़ा गया। ]

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 9 अगस्त, 1949, पृ. 301