अनुच्छेद 260 (जारी) - Page 98

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को ठीक से समझा है तो पं. कुंजरू जो कुछ चाहते हैं वह यह है कि वे आयकर के संग्रहण, आवंटन और वितरण को क्षेत्राधिकार से बाहर ले जाना चाहते हैं अर्थात् वित्त आयोग के क्षेत्र से बाहर ले जाना चाहते हैं। उनका तर्क था कि जबकि राष्ट्रपति केन्द्रीय उत्पाद शुल्क का आवंटन करने में वित्त आयोग की सलाह लेगा, आयकर के संबंध में उसे वित्त आयोग से स्वतंत्र रखा गया है। उन्होंने केवल एक प्रतिबंध बताया है और वह यह है कि जहाँ तक आरंभिक आयकर वितरण का संबंध है राष्ट्रपति वित्त आयोग से परामर्श कर सकेगा ओर वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार या उन्हें ध्यान में रखकर कार्य कर सकेगा, लेकिन आयकर आवंटन का कोई भी पश्चात्वर्ती फेरफार, वित्त आयोग की सिफारिशों से स्वतंत्र, राष्ट्रपति पर छोड़ा जा सकता हैं। मेरे विचार में, अपने संशोधन के द्वारा वे जो कुछ चाहते हैं वह मैं ठीक समझ गया हूँ। इसलिए सवाल बहुत सरल है और छोटा-सा है। क्या प्रांतां और केन्द्र के बीच आयकर के वितरण में अन्तर करने में तथा विभिन्न प्रांतों में इस प्रकार कि पृथक रखे गए आयकर के आगमों के आवंटन में राष्ट्रपति को वित्त आयोग की सिफारिशों से सर्वथा स्वतंत्र रखा गया है ? मेरे द्वारा प्रस्तावित प्रारूप संशोधन में उपबंध किया गया है कि राष्ट्रपति, आयकर के वितरण और आवंटन के बारे में कोई भी परिवर्तन करने में वित्त आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखेगा। मैं उनके दृष्टिकोण को अच्छी तरह समझता हूँ कि यदि इसे वित्त आयोग की सिफारिशों पर राष्ट्रपति द्वारा विनिश्चय किए जाने के लिए छोड़ दिया जाता है तो राष्ट्रपति के हाथ इतने बंधे हो सकते हैं कि वह वित्त आयोग की सिफारिश पर या उस हंगामे पर झुक सकते हैं जो प्रांतों द्वारा किया जा सकता है जिसका परिणाम यह होगा कि उन्हें केन्द्रीय वित्त को क्षति पहुँचाने के लिए बाध्य किया जा सकता है। मैं उनकी भावनाओं की कद्र करता हूँ कि जहाँ तक वित्त का संबंध है, केन्द्र को अधिक से अधिक स्वतंत्र बनाया जाना चाहिए, क्योंकि मेरे विचार में, इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि हम संविधान में ऐसा कुछ न करे जिससे केन्द्रीय सरकार के राजनीतिक या वित्तीय अस्तित्व पर संकट छा जाए, बल्कि इसका दूसरा पक्ष भी है अर्थात् मान लीजिए, सभी प्रांतों ने हंगामा किया जिसकी कल्पना करना पूरी तरह संभव है क्योंकि यह उनका सामान्य हित होगा कि वे राष्ट्रपति से प्रांतों को और अधिक राजस्व आवंटित करने का आग्रह करें, क्या यह राष्ट्रपति को प्रांतों की दया पर छोड़ना नहीं होगा? दूसरी ओर, यदि आयोग की रिपोर्ट में यह सिफारिश की जाए कि केन्द्र को आयकर के अन्तर्गत प्रांतों से अधिक राजस्व न दिया जाए तो मेरे निर्णय में, प्रांतां को ऐसे विरोध के सामने झुकने से इंकार करने से राष्ट्रपति के हाथ मजबूत होंगे। यदि मैं इस भाषा का प्रयोग करूं जिससे हम अब भारत सरकार अधिनियम के अन्तर्गत परिचित हैं तो प्रारूप अनुच्छेद जैसा अब है और प्रस्तावित संशोधन के बीच अन्तर यह है कि पं. कुंजरू के अनुसार