6. बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम - Page 100

बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम-संशोधन विधेयक

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का सिद्धांत नया नहीं है, मैं दूसरा जो उदाहरण देना चाहता हूं, वह यह है कि मुझे ज्ञात हुआ है कि 1923 में सरकार ने शेतसनदी वतनदारों के संबंध में एक प्रस्ताव जारी किया था। 13 अक्तूबर के उक्त प्रस्ताव संख्या 9,319 में सरकार ने यह तय किया कि सेवाकार्य नहीं करने वाले शेतसनदी वतनदारों को सेवाकार्य के बोझ से मुक्त कर दिया जाए, बशर्ते कि वे पूरे भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए राजी हों।

महोदय! अब मैं सदन को एक हाल के उदाहरण की याद दिलाना चाहूंगा। मेरा तात्पर्य यहां जोशी विधेयक से है। जब जोशी विधेयक इस सदन में विचार-विमर्श के लिए प्रस्तुत किया गया, तभी यह स्पष्ट किया गया था कि जो जोशी सेवाकार्य नहीं करना चाहते हैं, उन्हें अपनी भूमि रखने की अनुमति दी जाए। मैं समझता हूं कि सरकार ने उस समय अपनी स्वेच्छा से ही विधेयक में एक उपबंध जोड़ दिया, जो गांव के जोशी समुदाय को भूमि पर कब्जा रखने की अनुमति देता है, बशर्ते कि वे पूरे भू-राजस्व का भुगतान करने को राजी हों। मेरे विधेयक का उपबंध जोशी विधेयक में पेश किए गए उपबंध से भिन्न नहीं है।

महोदय! अब मैं इस विषय पर कानूनी दृष्टि से भी तर्क देना चाहूंगा। मान लीजिए, उस उपबंध के न होने की स्थिति में एक महार वतनदार सेवाकार्य करने की बाध्यता से मुक्त होना चाहता है और मान लीजिए, सरकार अपने अधिकार का प्रयोग करके वतन को पुनः आरंभ करना चाहती है, तब सरकार क्या पुनर्ग्रहण करेगी? महोदय! मेरा निवेदन है कि सरकार केवल भू-राजस्व पुनर्ग्रहण करने की हकदार है तथा इससे अधिक और कुछ नहीं। अपने अनेक फैसलों के क्रम में बंबई उच्च न्यायालय की इनाम के संबंध में हमेशा यह मान्यता रही है कि अनुदान भू-राजस्व का होता है, भूमि का नहीं। यह बंबई उच्च न्यायालय का विचार है। महोदय! इसलिए मैं निवेदन करता हूं कि साधारण तौर पर इस उपबंध को लागू किए बिना, जो महार सेवाकार्य नहीं करना चाहते हैं, सरकार उनके संबंध में अधिक से अधिक यह कर सकती है कि उन्हें अपनी भूमि पर पूरे भू-राजस्व का निर्धारण करवाने को कह सकती है, क्योंकि इनाम केवल भू-राजस्व से छुटकारे के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अनुदान में भूमि शामिल नहीं है। मैं जानता हूं . . .

सरदार जी.एन. मजूमदार : क्या महारों के संबंध में भी?

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : हां, महारों के संबंध में भी। महोदय! मैं जानता हूं कि प्रिवी कौंसिल के दो फैसलों में न्यायाधीशों ने बताया था कि इस प्रकार की मान्यता को लागू करने का कोई औचित्य नहीं है। परंतु, महोदय, इन फैसलों के दिए जाने के बाद बंबई उच्च न्यायालय का भी एक फैसला है। मैं बोंबे लॉ रिपोर्टर-22, के पृष्ठ 275 का हवाला देता हूं, जिसमें उच्च न्यायालय ने प्रिवी कौंसिल के फैसले के बाद निर्णय लिया कि मान्यता लागू करना सही है और जो कारण दिया गया है, वह भी काफी महत्त्वपूर्ण है। कारण यह है। 1852 के अधिनियम के पारित हो जाने के बाद