बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम-संशोधन विधेयक
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एक-तिहाई पर्याप्त होगा और खजाने पर अतिरिक्त भार डाले बगैर लगान तथा बलूते से पर्याप्त पारिश्रमिक दिया जा सकेगा। मैं पूरी गंभीरता से पूछता हूं कि सरकार इस समस्त व्यय के भार को क्यों नहीं उठाती? सरकार सेवाकार्य के खर्च का भुगतान क्यों नहीं करती है? अन्य सरकारी कर्मचारियों के संबंध में सरकार ने साहसपूर्वक परिषद के समक्ष अतिरिक्त धन की मांग की है। महोदय! 1921 में सरकार ने ग्राम शिक्षकों का वेतन बढ़ाना मंजूर कर लिया। उसी वर्ष सरकार ने अधीनस्थ सेवाओं के कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव भी प्रस्तुत किए। इसके अतिरिक्त सरकार ने तलाठियों के वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव भी प्रस्तुत किए। इसके अतिरिक्त सरकार में इन वर्गों के प्रति इतनी शक्ति, साहस और सहानुभूति है कि वह इनकी सेवाओं के पारिश्रमिक के लिए वित्तीय प्रस्ताव को परिषद के समक्ष रख सकती है, तो उसमें महारों के संबंध में यही शक्ति, साहस और सहानुभूति क्यों नहीं है? महोदय! मैं नहीं समझ पाता कि सरकार उस व्यवस्था को क्यों कायम रखे हुए है या उसमें वह क्यों भागीदार है, जो महामहिम की प्रजा के एक वर्ग को अन्य वर्गों का दास या गुलाम बनाकर रखती है। मेरा निवेदन है कि कानूनी, नैतिक अथवा वित्तीय आधार पर विधेयक की धारा 4 में मैंने जो सिद्धांत प्रतिपादित किया है, वह उचित और न्यायसंगत है।
महोदय! अब मैं महार वतनदारों के दूसरे वर्ग के विषय में चर्चा करना चाहता हूं, जो वतन प्रथा को जारी रखना चाहते हैं, जो सेवाकार्य करना चाहते हें, बशर्ते कि उनकी शिकायतों को दूर कर दिया जाए। मैंने अपने विधेयक की धारा 6 में इन महारों के लिए एक उपबंध रखा है। इस धारा का यह उपबंध जिसे महार जनसंख्या के उस वर्ग के हितों को दृष्टिगत रखते हुए अधिनियमित करना है, जो गांवों में सेवाकार्य जारी रखना चाहते हैं, मुख्य रूप से बलूते व्यवस्था का पुनर्गठन है। मैंने सोच-समझकर ‘मुख्य रूप से बलूते व्यवस्था का पुनर्गठन’ शब्दों का प्रयोग किया है। यदि माननीय सदस्य अधिनियम में अधिनियमित की गई धाराओं का अध्ययन करेंगे, तो उन्हें ज्ञात होगा कि सर्वप्रथम बलूते को उपकर राशि में परिवर्तन करने के लिए एक प्रावधान है। दूसरे, उपकर राशि के साथ भू-राजस्व को वसूल करने का प्रावधान किया गया है। तीसरे, उपकर राशि को दो भागों में इस प्रकार विभाजित करने का प्रावधान है कि उसमें एक भाग किसानों के प्रति की गई सेवाओं के लिए है और दूसरा सरकार के प्रति की गई सेवाओं के लिए। सरकार के प्रति की गई सेवाओं के लिए उपकर राशि का विभाजित भाग अनिवार्य होगा, जबकि किसानों के प्रति दी गई निजी सेवाओं के लिए उपकर राशि का विभाजित भाग वैकल्पिक होगा। वे किसान जो अपनी निजी सेवा के लिए महार को नियुक्त करना चाहते हैं, उन्हें केवल उपकर का वह अंश देना होगा, जो कि निजी सेवा के लिए निश्चित किया गया है। दूसरी ओर यदि महार लोग किसानों की सेवा नहीं करना चाहते हैं और केवल सरकार की सेवा करना चाहते हैं, तो उपकर राशि का वह भाग जो निजी सेवाओं के लिए निर्धारित है, वे उस पर अधिकार खो देंगे।