86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
महोदय! अब सदन यह सोच सकता है कि मैं नए प्रस्ताव रख रहा हूं। मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि इनमें से कोई भी प्रावधान नया नहीं है। ये वतन अधिनियम में पहले से ही विद्यमान हैं। केवल वर्तमान व्यवस्था में एक परिवर्तन है — पुनर्गठन। बलूते को उपकर राशि में परिवर्तित करने संबंधी पहला प्रावधान वतन अधिनियम की धारा 19 में पहले से ही विद्यमान है। अतः यह नया नहीं है। वर्तमान वतन अधिनियम के अंतर्गत कलक्टर को यह अधिकार है कि वह जब भी उचित समझे बलूते को उपकर राशि में परिवर्तित कर सकता है। मैं पुनः निवेदन करता हूं कि दूसरा प्रावधान कि भू-राजस्व के साथ ही उपकर की वसूली संबंधी प्रावधान भी नया नहीं है। यह पहले ही वतन अधिनियम में विद्यमान है। वतन अधिनियम की धारा 81 को देखने पर हमें ज्ञात होगा कि कलक्टर को वर्तमान अधिनियम के अधीन सभी हक, पारिश्रमिक और लाभ वसूली का यह मानकर अधिकार है कि वे बकाया भू-राजस्व हैं। अतः मेरा निवेदन है कि विधेयक की धारा 6 में कुछ नया नहीं है। मेरे विधेयक की धारा 6 में जो कुछ नया है, वह यह है कि निर्णय लेने का अधिकार कलक्टर के बजाए संबंधित पक्षों को दिया गया है। वर्तमान कानून मानता है कि ऐसे हालात उत्पन्न होंगे और तब मेरे विधेयक की धारा 6 के अंतर्गत विचाराधीन प्रावधान आवश्यक होंगे। अन्यथा, ऐसे प्रावधानों का वर्तमान कानून में कोई स्थान नहीं होता। मैं जो महसूस करता हूं वह यह है कि यद्यपि कलक्टर को भी निर्णय लेने का अधिकार है, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि वह इस तथ्य से अवगत हो कि ऐसे हालात उत्पन्न हो गए हैं, जब उसके लिए निर्णय लेना आवश्यक हो गया है। मेरा कहना केवल यह है कि स्वयं संबंधित पक्षों को निर्णय लेने के संबंध में कलक्टर का मार्गदर्शन करना चाहिए, जिससे संबंधित पक्ष यदि चाहें कि बलूते की वसूली भू-राजस्व के साथ की जाए, तो कलक्टर को इससे ज्ञात हो जाएगा कि अपना निर्णय लेने का समय आ गया है। इसमें कुछ भी नवीन नहीं है, सिवाए इसके कि निर्णय का अधिकार कलक्टर के बजाए किसानों और महारों को हस्तांतरित हो जाएगा।
महोदय! तीसरा प्रावधान जो बलूते के दो विशेष भागों में निजी सेवाओं के लिए और दूसरा सरकारी सेवाओं के लिए विभाजित करने के संबंध में है, निस्संदेह नया है। परंतु मैं निवेदन करना चाहता हूं कि परिस्थितियों ने उसे अत्यधिक आवश्यक बना दिया है। सरकार के दृष्टिकोण के अनुसार किसान और सरकार के प्रति की गई सेवाओं के लिए बलूते संयुक्त भुगतान है। 3 मई 1899 को सरकार ने प्रस्ताव संख्या 3,074 पारित किया, जिसमें यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किसान और सरकार के प्रति की गई सेवाओं के लिए बलूते संयुक्त पारिश्रमिक है। अपने इस दृष्टिकोण के समर्थन में मुझे इतना अधिक पीछे जाने की आवश्यकता नहीं है। 1919 में सरकार ने सदन के समक्ष उस विषय पर उठाए गए सवाल के जवाब में जो कागजात रखे थे, उसके लिए सरकार ने सहायक सचिव के आदेश का सहरा