बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम-संशोधन विधेयक
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लिया था, जिसमें इस प्रस्ताव पर स्पष्ट रूप से जोर दिया गया था कि बलूते का भुगतान केवल निजी सेवाओं के लिए ही नहीं है, सरकार के प्रति सेवाओं के लिए भी है। महोदय! अब मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह है कि कुछ महार सरकार की तो सेवा करना चाहते हैं, परंतु किसानों की नहीं। मैं जानता हूं कि ऐसे भी किसान हैं, जो वर्तमान कानून द्वारा महारों जैसी कोई एजेंसी अपने ऊपर थोपे जाने को पसंद नहीं करते हैं। वे स्वेच्छा से जिसे चाहेंगे, उसे नियुक्त करेंगे। इसी तरह कुछ महार भी हैं, जो किसानों की सेवा नहीं करना चाहते हैं। वे स्वतंत्र निर्णय लेना चाहते हैं कि सेवा करें या न करें। परंतु वर्तमान कानून के अनुसार इस स्वतंत्रता से वे वंचित हैं। वे चाहें अथवा नहीं, सेवाकार्य के लिए बाध्य हैं। इसका कारण यह है कि बलूते संयुक्त पारिश्रमिक है और ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे यह मालूम किया जा सके कि सरकारी सेवाओं और निजी सेवाओं के लिए पारिश्रमिक के रूप में कितना बलूते है। सामाजिक प्रगति की प्रतिस्पर्द्धा के इन दिनों में किसानों और महारों के बीच रंजिश अधिक बढ़ी है और यह अधिक गहरी होती जाएगी, जब तक कि नियुक्ति की स्वतंत्रता और सेवाकार्य की स्वतंत्रता नहीं दी जाएगी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसानों की निजी सेवाओं और सरकार के प्रति की गई सेवाओं के लिए देय बलूते का हिस्सा परिभाषित करना आवश्यक है। वर्तमान परिस्थितियों में यदि कोई महार सरकार के लिए सेवाकार्य नहीं करता है, तो बलूते का कोई विभाजन नहीं होने की वजह से किसान को उसे पूरे बलूते का भुगतान करना पड़ता है और इस प्रकार महार किसानों से लाभ उठाता है।
दूसरी ओर, यदि महार किसान के लिए सेवाकार्य नहीं करता है और केवल सरकार के लिए सेवाकार्य करता है, तो उसे पूरे बलूते को खोना पड़ता है। इसका कारण यह है कि सरकार यह नहीं जानती कि उसके प्रति की गई सेवाओं के लिए उसे कितने बलूते का भुगतान महार को करना है। इसे न जानने के नाम पर वह सारा भुगतान रोक लेती है और महारों का बेजा नुकसान कर देती है। अतः मेरा विचार है कि बेहतर प्रशासन और ग्रामों में शांति के लिए यह बहुत आवश्यक है कि बलूते का विभाजन किया जाए। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि यह कानूनी सिद्धांत के सर्वथा विपरीत है कि जनता के एक वर्ग के सेवाकार्य को जनता के दूसरे वर्गों पर थोपा जाए। ऐसी व्यवस्था को कायम रखना बड़ा ही नृशंसतापूर्ण है, जिसमें किसी अन्य नाई का बहिष्कार करके केवल एक विशेष नाई ही हमारी हजामत बना सके। परंतु वतन व्यवस्था ऐसी ही घृणित और नृशंस व्यवस्था है। मेरा मानना है कि सदन के वकील सदस्य जानते होंगे कि उच्च न्यायालय में ऐसा मुकदमा आया था, जिसमें एक नाई ने मुकदमा किया था कि अमुक गांव के यजमानों (किसानों) को उसके अलावा बाहर के किसी अन्य नाई की सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार नहीं है, चाहे वह हजामत बनाने में कुशल हो अथवा नहीं। यही बात महारों के संबंध में है। मेरे विधेयक का