88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
उद्देश्य अनुबंध से मुक्ति है। यदि किसान महारों को काम पर रखना नहीं चाहते हैं, तो उन्हें ऐसा करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि महार सेवाकार्य नहीं करना चाहते हैं, तो उनको सेवाकार्य न करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। परंतु वर्तमान संयुक्त पारिश्रमिक व्यवस्था के अंतर्गत अनुबंध की इस स्वतंत्रता को नकार दिया गया है और वह सुलभ नहीं है। मेरी योजना में अनुबंध संबंधी इस स्वतंत्रता की व्यवस्था है, और मेरा विचार है कि कम से कम इस शताब्दी में जब कि हरेक समाज प्रतिष्ठा से अनुबंध की ओर बढ़ रहा है, हमें महारों और किसानों को अनुबंध की स्वतंत्रता देने से इंकार करके भारतीय समाज की प्रगति में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
एक बात मैं यह कहना चाहूंगा कि जिस व्यवस्था की रूपरेखा मैंने इस विधेयक में दी है, वह पूर्ण रूप से मेरी नहीं है। इस व्यवस्था को मैंने बरार से लिया है। मध्य प्रांत तथा बरार में किसान और महारों के मध्य इसी तरह के झगड़े तथा गड़बड़ चल रही थी। दोनों पक्षों ने आंदोलन चला रखे थे। सरकार ने इस विषय में खोजबीन करके सुझाव देने के लिए एक कमेटी नियुक्त की थी। 1920 में कमेटी ने अपने सुझाव दिए और सरकार ने इस व्यवस्था को लागू किया, जिसे मैंने अपने विधेयक के प्रावधानों में मुख्य रूप से पुनः प्रस्तुत किया है। मेरा निवेदन है कि इस विधेयक के जो प्रावधान बरार कमेटी के सुझावों के परिणामस्वरूप हैं, यदि वे बरार के लिए समुचित हैं तो मेरा विचार है कि वे बंबई प्रेसिडेंसी के लिए अनुचित नहीं हो सकते, क्योंकि बरार व्यवस्था बंबई व्यवस्था की प्रतिकृति है। यहां तक कि बरार कमेटी की पूरी रिपोर्ट बंबई सरकार के प्रस्तावों पर आधारित है। विधेयक के ये प्रमुख प्रावधान हैं।
विधेयक में एक प्रावधान है, जिसकी संभवतः संक्षिप्त व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है। इस प्रावधान के अंतर्गत वतन अधिनिमय की धारा 9 में निर्दिष्ट परिवर्तन प्रस्तुत किए गए हैं। मेरा अभिप्राय मेरे विधेयक के खंड 2 और खंड 3 से है। वतन अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत यह कहा गया है कि वतन भूमि को वतन परिवार से बाहर किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा। धारा 9 के अंतर्गत भी एक प्रावधान है, जिसमें कलक्टर को गैर-वतनदार को हस्तांतरित की गई किसी वतनदार की भूमि वापिस लेने का अधिकार दिया गया है। परंतु धारा 9 के अंतर्गत हस्तांतरण को अमान्य घोषित करना या न करना और ऐसी हस्तांतरित भूमि को वापिस लेना या न लेना पूर्ण रूप से कलक्टर के निर्णय पर छोड़ दिया गया है। कलक्टर धारा 9 के अंतर्गत दिए गए अपने निर्णय के अधिकार को हमेशा वतनदार के पक्ष में प्रयोग करना पसंद नहीं करता। इससे कोई विशेष कठिनाई न होती हो, जबकि ऐसी हस्तांतरित भूमि वतन भूमि होते हुए भी स्थानापन्न रूप से काम करने वाले किसी वतनदार को पारिश्रमिक के रूप में नहीं दी गई है। महोदय! परंतु मैं निवेदन करता हूं कि यदि किसी स्थानापन्न रूप में काम करने वाले व्यक्ति से इस स्पष्ट शर्त पर सरकार के लिए सेवा करने को कहा गया है कि उसे उसके कार्यों