92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
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(बहस पुनः आरंभ)
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! वास्तव में इस सदन के गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा इस कार्यवाही में पूर्ण समर्थन देने के लिए मैं उनका अत्यंत आभारी हूं। बहस से यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि इस विधेयक का विरोध करने वाले इसके विरुद्ध कोई ठोस तर्क प्रस्तुत कर सके हैं। मैं नहीं समझता कि मेरे लिए इस समय उनके द्वारा उठाई गई आपत्तियों का विस्तार से जवाब देना आवश्यक है। उन्होंने जो भी मुद्दे इस सदन के समक्ष उठाए हैं, उन्हें हम पूर्वाग्रह से ग्रस्त मुद्दे कह सकते हैं और ये मुद्दे ऐसे हैं, जिनका स्वयं विधेयक में निहित लाभों से कोई संबंध नहीं है। महोदय! मैंने अपने आरंभिक भाषण में स्वीकार किया है कि विधेयक में निस्संदेह कुछ खामियां हैं, जैसा कि मेरे सामने बैठे कुछ माननीय सदस्यों ने उल्लेख किया है। मैंने अपने आरंभिक भाषण में स्पष्ट रूप से कहा था कि मैं प्रवर समिति को पूरी स्वतंत्रता देता हूं कि वह जो भी संशोधन करना चाहे, कर सकती है। इस विषय में मुझे कोई आपत्ति नहीं है . . .
एक माननीय सदस्य : क्या सिद्धांतों में भी संशोधनों का?
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : प्रवर समिति जो भी संशोधन करना चाहे, यहां तक कि सिद्धांतों में भी, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
सरदार जी.एन. मजूमदार : क्या सिद्धांत में भी?
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : हां, मैं इस विधेयक को अधिकारियों की दया पर छोड़ने की अपेक्षा, सदन के गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा गठित प्रवर समिति पर छोड़ना चाहूंगा। ऐसा करने के लिए मैं तैयार हूं। विधेयक का परिणाम चाहे जो कुछ भी हो, परंतु मैं सदन के गैर-सरकारी सदस्यों की प्रवर समिति पर इसे छोड़ता हूं। महोदय! मैं नहीं समझता कि इस प्रक्रिया से माननीय राजस्व मंत्री को कोई असुविधा होगी। मैं इस विधेयक में अधिकारियों के खिलाफ कोई दोषारोपण अथवा शिकायतें शामिल नहीं करना चाहता हूं। परंतु मैं यह कहने के लिए बाध्य हूं कि उन्होंने इस विषय के प्रति उतनी तत्परता, महत्त्व और ध्यान नहीं दिया है, जितना कि दलित वर्ग ने दिया है। मुझे याद है कि इस सदन में फरवरी 1923 को विशेष रूप से विधेयक के कुछ प्रावधानों पर विचार करने के लिए प्रस्ताव रखा गया था। सदन के गैर-सरकारी सदस्यों से पूरे प्रस्ताव को अत्यधिक समर्थन मिला था। माननीय राजस्व मंत्री ने प्रस्तावक सदस्य को स्पष्ट रूप से इस शर्त पर प्रस्ताव वापस लेने को तैयार कर लिया था कि वह इस संबंध में तत्काल जांच-पड़ताल शुरू करेंगे। तब से चार या पांच वर्ष बीत गए हैं, परंतु
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 23, पृ. 791-93, 4 अगस्त 1928