104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इस व्यवस्था की शर्तों का नियंत्रण 1980 के बंबई अधिनियम 1 द्वारा नियंत्रित है। कोलाबा जिले में इसकी शर्तों का नियंत्रण रिवाज व प्रथा द्वारा होता है तथा थाना जिले में अनुदान द्वारा।
भू-धारण की खोत व्यवस्था इस मायने में भू-धारण की सामान्य रैयतवाड़ी व्यवस्था से भिन्न है, क्योंकि रैयतवाड़ी व्यवस्था में सरकार भूमि के दखलकारों से सीधे भू-राजस्व की वसूली करती है, जबकि खोती व्यवस्था में सरकार भू-राजस्व की वसूली के लिए खोज लोगों को नियुक्त करती है।
भू-धारण की खोती व्यवस्था जहां एक ओर खोत को बाध्य करती है कि वह सरकार को राजस्व का भुगतान करे, वहीं दूसरी ओर यह उसे स्वतंत्रता देती है कि वह अधीनस्थ धारकों के साथ जैसा चाहे व्यवहार करे और इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग
खोत लोगों द्वारा इस सीमा तक किया जाता है कि न केवल बल प्रयोग करके अधीनस्थ धारकों से धन और सामान की वसूली की जाती है, बल्कि उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए विवश किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से अधीनस्थ धारकों ने खोत लोगों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन छेड़ रखा है और वे खोती व्यवस्था के उन्मूलन की मांग कर रहे हैं। खोत लोगों और अधीनस्थ धारकों के बीच संबंध इतने खराब हो गए हैं कि तीन खोत लोगों की अधीनस्थ धारकों द्वारा हत्या कर दी गई।
जहां भू-धारण की खोती व्यवस्था का एक लाभ भू-राजस्व की प्राप्ति को सुलभ कराना है, वहीं इससे होने वाले नुकसान इतने अधिक हैं कि बंबई प्रेसिडेंसी में शांति और व्यवस्था की स्थिति को भंग किए बिना इसे जारी नहीं रखा जा सकता है। अतः इस व्यवस्था का उन्मूलन अत्यावश्यक है।
विधेयक के उद्देश्य हैं —
(I) खोती व्यवस्था का उन्मूलन तथा सरकार और भूमि के उन धारकों के बीच सीधा संबंध स्थापित करना, जो खोत लोगों के लाभप्रद प्रबंध के अधीन हैं,
(II) खोत लोगों के अधिकारों को क्षतिपूर्ति के लिए उचित मुआवजे़ देने के प्रावधान करने,
(III) भू-राजस्व संहिता के अंतर्गत उन अधीनस्थ धारकों को वास्तव में जिनके कब्जे में भूमि है, उन्हें दखलकार का दर्जा देना, और
(IV) अन्य आकस्मिक प्रयोजनों के लिए प्रावधान करना।
(हस्ताक्षर) भीमराव अम्बेडकर
एच.के. चेनानी
सचिव, बंबई विधान सभा पूना, 18 अक्तूबर 1937
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