खोती व्यवस्था उन्मूलन विधेयक
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खोती व्यवस्था के उन्मूलन हेतु विधेयक
डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर, भायखला और परेल) : महोदय! मैं खोती व्यवस्था के उन्मूलन के लिए एक विधेयक प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूं। प्रस्ताव के समर्थन में आपने हमें संक्षिप्त वक्तव्य देने का जो निर्देश दिया है, तो जहां तक मेरा संबंध है मेरे प्रस्ताव में मात्र उद्देश्यों और कारणों के विवरण का ही उल्लेख होगा। अध्यक्ष महोदय! मैं बताना चाहूंगा कि खोती व्यवस्था का उन्मूलन जैसे महत्त्वपूर्ण विधेयक के लिए उद्देश्यों और कारणों का इतना संक्षिप्त विवरण कभी भी तैयार नहीं किया गया है।
खोत व्यवस्था, बंबई प्रेसिडेंसी में भू-धारण की एक लघु व्यवस्था है। यह अधिकतर रत्नागिरी जिले और कोलाबा तथा थाना जिले के कुछ भागों में प्रचलित है।
भू-धारण की खेती व्यवस्था की शर्तें कुछ मामलों में कानून से और कुछ में रिवाज और प्रथा से तथा शेष मामलों में अनुदान से नियंत्रित हैं। रत्नागिरी जिले में इस व्यवस्था की शर्तों का नियंत्रण 1880 के बंबई अधिनियम 1 द्वारा किया जाता है। कोलाबा जिले में इसकी शर्तों का नियंत्रण रिवाज और प्रथा द्वारा होता है तथा थाना जिले में अनुदान द्वारा।
भू-धारण की खोती व्यवस्था इस मायने में भू-धारण की सामान्य रैयतवाड़ी व्यवस्था से भिन्न है, क्योंकि रैयतवाड़ी व्यवस्था में सरकार भूमि के दखलकारों से सीधे भू-राजस्व की वसूली करती है, जबकि खोती व्यवस्था में सरकार भू-राजस्व की वसूली के लिए खोज लोगों को नियुक्त करती है।
भू-धारण की खोती व्यवस्था जहां एक ओर खोत को बाध्य करती है कि वह सरकार को राजस्व का भुगतान करे, वहीं दूसरी ओर यह उसे स्वतंत्रता देती है कि वह अधीनस्थ धारकों के साथ जैसा चाहे व्यवहार करे, और इस स्वतंत्रता का खोत लोगों द्वारा दुरुपयोग इस सीमा तक किया जाता है कि न केवल बल प्रयोग करके अधीनस्थ धारकों से धन और सामान की वसूली की जाती है, बल्कि उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए विवश किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से अधीनस्थ धारकों ने खोत लोगों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन छेड़ रखा है और ये खोती व्यवस्था के उन्मूलन की मांग कर रहे हैं। खोत लोगों और अधीनस्थ धारकों के बीच संबंध इतने खराब हो गए हैं कि तीन खोत लोगों की अधीनस्थ धारकों द्वारा हत्या कर दी गई।
जहां भू-धारण की खोती व्यवस्था का एक लाभ भू-राजस्व की प्राप्ति को सुलभ कराना है, वहीं इससे होने वाले नुकसान इतने अधिक हैं कि बंबई प्रेसिडेंसी में शांति और व्यवस्था की स्थिति को भंग किए बिना इसे जारी नहीं रखा जा सकता है। अतः इस प्रणाली का उन्मूलन अत्यावश्यक है।
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 1, पृ. 1087-89, 17 सितंबर 1937, डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित विधेयक पृ. 111-116 पर पुनः प्रस्तुत।