8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 126

ग्राम पंचायत विधेयक

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संतुष्ट नहीं है। तथ्यों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने पर पता चलेगा कि इस प्रेसिडेंसी में एक ऐसा सशक्त वर्ग है, जो यह मानने को तैयार नहीं है कि इस सरकार को शासन करने का कोई नैतिक अधिकार प्राप्त है। महोदय! हमें यह भी मालूम है कि हमने नए संविधान को तैयार करने का कार्य प्रारंभ कर दिया है। हम जानते हैं कि हम भारत के लिए एक ऐसे संविधान का निर्माण करने जा रहे हैं जो जनता की सरकार के लिए, जनता द्वारा और जनता के लिए होगा। हमारा यह आशा करना उचित है कि नए संविधान को एक अथवा दो वर्षों की अल्प अवधि में तैयार कर लिया जाएगा और जनता के सभी वर्गों द्वारा पूर्ण समर्पित सरकार की स्थापना हो जाएगी। महोदय! इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैं मंत्री महोदय तथा सत्ता पक्ष के माननीय सदस्यों को यह बताना चाहूंगा कि उनकी वर्तमान स्थिति किसी कार्यवाहक से बेहतर नहीं है। महोदय! निर्विवाद रूप से एक रखवाला उस इमारत में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं कर सकता, जिसकी देखभाल के लिए उसकी नियुक्ति की गई है। अधिक से अधिक वह वास्तविक मालिक के आने के पूर्व के अंतराल में भवन को चालू हालत में बनाए रखने के लिए मरम्मत करवा सकता है।

मैं मंत्री महोदय को संसदीय मामलों का सादृश्य भी देना चाहूंगा। इंग्लैंड में जहां शताब्दियों से संसदीय व्यवस्था चल रही है, एक मंत्रिमंडल पराजित होता है, पराजित मंत्रिमंडल तत्काल त्यागपत्र न देकर तथा विपक्ष को सत्ता की बागडोर न सौंपकर चुनाव करना पसंद करता है। ऐसी स्थिति में संविधान की यह स्वीकृत परंपरा है कि ऐसे मंत्रिमंडल को किसी भी तरह के विधान का दायित्व नहीं लेना चाहिए। वे केवल इतना कर सकते हैं कि जब तक मतदाता अपना निर्णय नहीं दे देते, तब तक प्रशासन की देखभाल करें, ताकि नई सरकार को पुरानी सरकार के किसी भी कार्य की वजह से शर्मिंदगी न उठानी पड़े। मैं मंत्री महोदय से पूछता हूं कि क्या वह संसदीय संविधान की परंपरा का पालन नहीं करना चाहेंगे? यह निर्णय मैं उन पर ही छोड़ता हूं।

महोदय! मैं कोई कारण नहीं समझ पाता कि मंत्री महोदय इस विधेयक को पारित करवाने के लिए इतनी जल्दबाजी क्यों दिखा रहे हैं, केवल सात दिनों की सूचना देकर? मुझे नहीं लगता कि इसके पीछे कोई बहुत बड़ा आग्रह है, इसकी कोई बहुत आवश्यकता है, न ही इस प्रेसिडेंसी के लोगों ने इस विधेयक को प्रस्तुत करने के लिए उन पर कोई अतिशय जोर डाला है। जहां तक मेरी जानकारी है, इस प्रेसिडेंसी की किसी भी राजनैतिक पार्टी ने इस मुद्दे को अपनी पार्टी का विषय नहीं बनाया है। मैं नहीं जानता कि उदारवादियों, दायित्वबोध वालों या गैर-ब्राह्मणों अथवा कांग्रेस के सदस्यों ने, जो पिछली विधान परिषद के समय इस सदन में थे, कभी इस बात पर जोर दिया हो कि ग्राम पंचायतों को शुरू करना उनके कार्यक्रम का मूलभूत तत्त्व है। मैं ऐसा कुछ नहीं जानता। यही नहीं, मुझे नहीं लगता कि जनसाधारण इस विधेयक के लिए शोर मचा रहा है। यदि आप इस मुद्दे पर 1925 में तैयार की गई उस समिति की रिपोर्ट