110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
को पढ़ें, जिसे ग्राम पंचायत अधिनियम, 1920 की कार्यप्रणाली पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया था, तो आपको क्या मिलेगा? आपको यह मिलेगा कि मोटे तौर पर इस प्रेसिडेंसी में 30,000 गांव हैं। 1920 में यह अधिनियम लोगों को यह स्वतंत्रता देते हुए पारित किया गया था कि वे इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए स्वैच्छिक रूप से आवेदन दे सकते हैं। लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ कि सिंध के लोगों ने ग्राम पंचायतों की शुरुआत करने का विरोध किया। इसीलिए हम सिंध प्रांत के एक भी गांव में पंचायत स्थापित हुई नहीं पाते हैं। मुख्य प्रेसिडेंसी में ये बहुत ही थोड़ी संख्या में हैं — 323 के लगभग। मैं मानता हूं कि यह लोगों की नागरिक चेतना की दुखद अभिव्यक्ति है। इसके अतिरिक्त, यह स्पष्ट प्रमाण है कि लोग ग्राम पंचायत की शुरुआत के लिए चिंतित नहीं हैं। मैं इस समय इसके कारणों में नहीं जाना चाहता, लेकिन मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि मेरे माननीय मित्र, स्थानीय स्वशासन मंत्री मानेंगे कि यह स्थिति का सही विश्लेषण है। यही नहीं, बल्कि मैं यह भी कहना चाहता हूं कि उन्होंने ग्राम पंचायतों के कार्यों में न्यायिक कार्य को जोड़ दिया है, ताकि उसे मीठी टिकिया की तरह ज्यादा आसानी से निगला जा सके। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, मुझे लगता है कि मंत्री महोदय के लिए यही बेहतर होगा कि इस विधेयक को अनिश्चित काल तक स्थगित कर दें, ताकि लोगों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाली नई सरकार उसके आशय और गुण-दोषों पर विचार कर सके।
महोदय! अब इस विधेयक के गुणावगुण की बात करते हैं। मैं देख रहा हूं कि विधेयक के दो भाग हैं। पहला भाग स्थानीय स्वशासन के निकाय के रूप में पंचायत के कार्यों से संबंधित है। मैं बिना हिचक कहना चाहता हूं कि सिद्धांत रूप में मुझे हस्तांतरण की नीति पर कोई ऐतराज नहीं है, अगर यह पाया गया कि इस प्रेसिडेंसी की स्थानीय समितियों पर, स्थानीय समिति अधिनियम के द्वारा सौंपे गए कार्यों का अत्यधिक भार है और इस कारण अगर वे अपने कार्य कुशलता से नहीं निभा पाते, तो मैं कहूंगा ‘स्थानीय समितियों का भार हल्का करने के लिए निश्चित रूप से पंचायतों को स्थापित किया जाए।’ महोदय! अगर अपने हितों के लिए पंचायतों को स्थापित करने की इच्छा है, तो यह बड़ी खतरनाक व्यवस्था का प्रत्यावर्तन होगा। बहुतों ने ग्राम पंचायतों की पुरानी व्यवस्था की प्रशंसा की है। अनेक लोगों ने इसे ‘ग्रामीण गणतंत्र’ कहा है। इस ग्रामीण गणतंत्र की जो भी खूबियां हों मुझे यह कहने में रत्ती भर भी झिझक महसूस नहीं होती कि ये भारत के सार्वजनिक जीवन के विनाश का कारण रही हैं।
श्री पेस्टनशाह एन. वकील : प्रश्न।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अगर भारत राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने में कामयाब नहीं हो पाया है, अगर भारत राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करने में कामयाब नहीं हो पाया है तो मेरे विचार से इसका मुख्य कारण ग्राम व्यवस्था का अस्तित्व में होना है। इसने लोगों को स्थानीय राष्ट्रीयता से, स्थानीय एकनिष्ठता से सराबोर कर दिया। इसमें