ग्राम पंचायत विधेयक
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विस्तृत नागरिक चेतना के लिए कोई स्थान नहीं बचा। कुछ भी नहीं। प्राचीन ग्राम पंचायतों के अंतर्गत, भारत संगठित लोगों का देश बनने के बजाए ग्रामीण समुदाय का एक जमघट बन गया, जिसमें आम राजा के प्रति सामान्य निष्ठा के सिवाए और कोई साझापन नहीं था। महोदय! मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि ऐसा केवल मेरा ही दृष्टिकोण नहीं है। 1925 में नियुक्त की गई समिति के एक सदस्य ने भी यही बात कही थी। मैं अपने मित्र श्री आर.जी. प्रधान के कथन का उल्लेख करता हूं। अपने बयान में उन्होंने कहा था :
अत्यधिक ग्रामीण राष्ट्रीयता तथा ग्रामीण भावना, जिसका इन समुदायों ने पोषण
किया है, वह पूर्णतः भारत की प्रादेशिक एकता या हमारे प्रत्येक प्राकृतिक क्षेत्रीय
खंडों की जातीय एकता पर आधारित शक्तिशाली भारतीय राष्ट्रीयता के विकास
में घातक सिद्ध हुई है।
श्री पेस्टनशाह एन. वकील : क्या श्री आर.जी. प्रधान इतिहासकार हैं?
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मुझे नहीं लगता कि हमें यहां इतिहासकारों की आवश्यकता है; हमें इतिहासकारों से सावधान रहना चाहिए। आजकल जब आप राष्ट्रीय चेतना, समान राष्ट्रीयता और भारतीय नागरिकता की समान चेतना स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, मेरे विचार में हमें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो इस प्रयास को निष्प्रभावित और कमजोर कर दे। मैं मामले के इस पहलू को यहीं खत्म करना चाहता हूं।
मेरी अगली आपत्ति पंचायतों के गठन से संबंधित है। जैसा कि माननीय सदस्य ने बताया है कि विधेयक में यह प्रावधान है कि ग्राम पंचायतों का निर्वाचन महिलाओं व पुरुषों, दोनों के वयस्क मतों के आधार पर किया जाएगा। जहां तक मेरा संबंध है, मैं तुरंत यह कहना चाहता हूं कि ‘यहां तक तो ठीक है’, लेकिन मैं महोदय के समक्ष यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि दलित वर्गों के बारे में बात करते हुए मुझे यह कहते हुए जरा भी हिचक महसूस नहीं हो रही है कि वयस्क मतदान हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। महोदय यह भूल गए हैं कि दलित वर्ग प्रत्येक गांव में अल्पसंख्यक हैं, एक दयनीय अल्पसंख्यक, और हम मान लेते हैं कि वे वयस्क मताधिकार अपनाएंगे। इसके साथ मुझे विश्वास है कि वह यह भी मानेंगे कि वयस्क मतदान अल्पसंख्यकों को बहुमत में परिवर्तित नहीं कर सकता। परिणामस्वरूप, मैं आग्रह करूंगा कि अगर ये ग्राम पंचायतें बनती हैं, तो अल्पसंख्यकों के लिए उनमें विशेष प्रतिनिधित्व होना चाहिए। किसी भी कीमत पर दलित वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व होना चाहिए, अन्य निस्संदेह अपने लिए स्वयं बोलेंगे।
महोदय! मैं जानता हूं कि इस सदन में ऐसा एक वर्ग मौजूद है, जो तुरंत यह कहेगा कि यह सांप्रदायिकता है। मैं भी मानता हूं कि यह सांप्रदायिकता है। परंतु मुझे विश्वास हो गया कि सांप्रदायिकता ही मेरी नीति होनी चाहिए। मुझे इस बात के लिए कोई शर्म महसूस नहीं होती।