8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 129

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

श्री जे.बी. पेटिट : क्या यह राष्ट्रीयता के अनुकूल है?

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अवश्य ही। क्यों नहीं?

डॉ. जे.बी. पेटिट : मुझे यह सुनकर प्रसन्नता हुई।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मेरा विचार है कि सांप्रदायिकता के बिना भारत किसी तरह राजनीतिक प्रगति नहीं कर सकता। सांप्रदायिकता के बिना भारत के लिए कोई स्वशासन नहीं हो सकता। यह एक ऐसा प्रस्ताव है, जिस पर मैं बिना किसी चुनौती के भय से दृढ़ रहूंगा।

इसलिए दलित वर्गों का पक्ष लेते हुए मैं तब तक भारत के लिए स्वशासन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकता, जब तक कि मुझे इस बात की संतुष्टि न हो जाए कि प्रत्येक स्वशासित संस्था में ऐसे प्रावधान हैं, जिसके अंतर्गत दलित वर्गों को उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए विशेष प्रतिनिधित्व देते हैं और जब तक ऐसा नहीं होता मुझे खेद है कि मेरे लिए विधेयक के पहले भाग पर अपनी सहमति देना संभव नहीं होगा।

महोदय! इस विषय में मुझे यह जानकर खुशी हुई कि इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करने के लिए 1925 में जो समिति गठित की गई थी, उसके दो सदस्यों ने दलित वर्गों के लिए विशिष्ट प्रतिनिधियों की मांग का समर्थन किया था। मैं श्री आर.जी. प्रधान के कथन की ओर ध्यान दिलाता हूं। उन्होंने कहा था :

मेरे विचार से ग्राम पंचायतों में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था नामांकन

द्वारा करनी चाहिए। नामांकन या तो कलक्टर या जिले के स्थानीय बोर्ड के अध्यक्ष

द्वारा होना चाहिए। बेहतर तो यही होगा कि यह काम अध्यक्ष करें। दलित वर्गों

के उचित प्रतिनिधित्व के हितों की दृष्टि से यह बहुत ही वांछनीय है और इससे

भी बड़ी बात यह है कि उनका सामान्य स्तर उठाने के लिए तथा अन्य वर्गों को

यह अहसास दिलाने के लिए कि वह एक अलग समुदाय है, प्रत्येक ग्राम पंचायत

में दलित वर्ग का कम से कम एक सदस्य तो अवश्य होना चाहिए। इसलिए जहां

भी इन वर्गों का कोई भी सदस्य चुनाव के द्वारा न चुना गया हो, वहां नामांकन

का ही सहारा लेना चाहिए।

महोदय! मैं अपने माननीय मित्र श्री पी.आर. चिकोदी के कथन को उद्धृत करना

चाहता हूं।

उन्होंने भी एक पृथक विवरण में लिखा है, जो इस प्रकार है :

मुझे लगता है कि उन गांवों में जहां दलित वर्ग के कम से कम पचास वयस्क

व्यक्ति हों, वहां पंचायतों में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने के लिए

कोई तरीका अपनाना होगा, चाहे नामांकन द्वारा या आरक्षित सीटों की व्यवस्था

द्वारा। अभी इनके किसी भी प्रतिनिधित्व का आम निर्वाचन के द्वारा चुना जाना संभव

नहीं लगता, ऐसे प्रयास के विफल होने की सूचना मुझे विलंब से मिली है।

इस संदर्भ में मैं माननीय सदन के हिन्दू सदस्यों का ध्यान हाल ही में घटी घटनाओं