116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
बन गया है। मुझे विश्वास है कि मेरे माननीय मित्र ऐसा प्रयोग यहां पर नहीं करना चाहेंगे। मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लेना चाहता और इन बातों को ध्यान में रखते हुए मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि मैं विधेयक के दूसरे भाग में सम्मिलित सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता हूं कि दीवानी और फौजदारी, दोनों न्यायिक अधिकार पंचायत को सौंपे जाएं, जो वास्तव में एक निर्वाचित न्यायपालिका है। महोदय! इस प्रेसिडेंसी में चल रही गतिविधियों को देखते हुए और विशेषकर दलित वर्गों की स्थिति देखते हुए मैं यह कहने को बाध्य हूं कि जहां तक हमारा सवाल है, हम पंचायत की देख-रेख में संचालित न्यायपालिका पर कभी अपनी सहमति नहीं दे सकते। हमारी बहुत विशिष्ट या कह सकते हैं कि बहुत करुणाजनक स्थिति है। हमारा एक छोटा समूह है, जो गांव के एक किनारे पर बसता है। हमें कभी भी गांव के समाज का अनिवार्य अंग नहीं समझा जाता। गांव में रहने के बावजूद भी हम बाहरी व्यक्ति माने जाते हैं, जिसकी प्रगति को बाकी समुदाय ईर्ष्या से देखता है। मेरे माननीय मित्र, श्री कामथ अपना सिर हिला रहे हैं, इसलिए मुझे लगता है कि मैं राज्य समिति की रिपोर्ट उनके समक्ष पढ़ूं, जो मैं पढ़ना नहीं चाहता था। समिति की रिपोर्ट के पैरा 102 में गांव में दलित वर्गों की स्थिति का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। समिति के अनुसार :
यद्यपि समस्त सार्वजनिक सुविधाओं के अधिकार दिलाने के लिए हमने दलित
वर्गों के लिए विभिन्न उपाय प्रस्तुत किए हैं, हमें डर है कि उनका इस्तेमाल करने
में लंबे समय तक मुश्किलें आएंगी। पहली मुश्किल है, रूढि़वादी वर्ग का उनके
विरुद्ध खुली हिंसा का भय। यह ध्यान में रखा जाए कि प्रत्येक गांव में दलित वर्ग
अल्पसंख्यक हैं, जिसके विपरीत विशाल रूढि़वादी वर्ग है, जो किसी भी कीमत
पर दलित वर्गों के संभावित हमले से अपने हितों व सम्मान की रक्षा करने को हर
समय तैयार रहता है। पुलिस के मुकदमें चलाए जाने के भय के कारण रूढि़वादी
वर्ग द्वारा हिंसा का सहारा लेने पर रोक लगी है और इसके परिणाम स्वरूप ऐसे
मामले इक्का-दुक्का ही होते हैं।
दूसरी मुश्किल दलित वर्ग की वर्तमान आर्थिक स्थिति से उत्पन्न होती हैं।
प्रेसिडेंसी के अधिकांश भागों में दलित वर्ग आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। कुछ
लोग रूढि़वादी वर्ग की भूमि पर उनकी इच्छा से पट्टेदार की हैसियत से खेती
करते हैं। कुछ रूढि़वादी वर्ग के खेतों पर मजदूरी करके निर्वाह करते हैं, और
अन्य रूढि़वादी वर्ग द्वारा दिए गए खाने या अनाज पर निर्भर हैं, जो उन्हें गांव के
नौकर के रूप में काम करने के लिए मिलता है। हमने ऐसी कई घटनाएं सुनी हैं,
जब रूढि़वादी वर्ग ने अपने गांवों में दलित वर्गों के विरुद्ध अपनी आर्थिक शक्ति
को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। जब दलित वर्गों ने अपने अधिकारों का
उपयोग करने की कोशिश की, तो उन्हें भूमि से बेदखल कर दिया गया, उनके
रोजगार खत्म कर दिए गए और गांव के नौकर के रूप में उन्हें पारिश्रमिक देना