8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 136

ग्राम पंचायत विधेयक

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नाम विशेष रूप से एक धारा में उल्लिखित करने में क्या हानि है? अगर संशोधन में यह स्वीकार है कि अल्पसंख्यकों की रक्षा करना आवश्यक है और यदि हम प्रेसिडेंसी की स्थिति से अवगत हैं कि प्रत्येक गांव में कोई और अल्पसंख्यक नहीं है, तो भी निश्चित रूप से दलित वर्ग व मुसलमान हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि अगर इन विशेष अल्पसंख्यकों का धारा में उल्लेख किया जाए, तो क्या आपत्ति हो सकती है। या तो हम ईमानदार बनकर यह कहें कि ऐसी धारा की कोई आवश्यकता नहीं है, जो विशेष अधिकार व सुरक्षा प्रदान करती है, या यह मान लें कि ऐसे समुदाय हैं जिन्हें विशेष सुरक्षा की आवश्यकता है, और अगर हम कार्य करना चाहते हैं, तो उस समुदाय को स्पष्ट करें, जिसे सुरक्षा की आवश्यकता है।

राव बहादुर जी.के. चितले : वह सुरक्षा क्या है?

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अगर हम मौजूदा स्थिति का ईमानदारी से सामना करना चाहते हैं, तो अधमना बने रहने की कोई गुंजाइश नहीं है।

महोदय! पूर्व वक्ता माननीय राव बहादुर चितले ने दो प्रस्तावों का समर्थन किया है। सबसे पहले, उन्होंने कहा है कि मेरे माननीय मित्र श्री मिट्ठा द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार कर हम संविधि को विकृत कर रहे हैं। महोदय! मैं अपने माननीय मित्र को यह याद दिलाना चाहता हूं कि ऐसी आपत्तियों के लिए बहुत देर हो गई है। हमारे पास किसी प्रांत विशेष के लिए संविधान नहीं होगा। हमारे पास किसी विशेष प्रांत के लिए नहीं, बल्कि सभी प्रांतों के लिए संविधान होगा, संपूर्ण भारत के लिए एक संविधान होगा, जो इस सिद्धांत को जैसा कि हम चाह रहे हैं, उतनी ही स्पष्टता से मान्यता देगा।

माननीय सदस्यगण : वाह!

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अब बहुत देर हो चुकी है। जो अपील मेरे माननीय मित्र ने इस सदन में प्रस्तुत की है, यह वही अपील है, जो गोलमेज सम्मेलन में अनेक निष्ठावान लोगों ने की थी और महोदय! हम जानते हैं कि वह सब असफल हुए और न सिर्फ असफल हुए, बल्कि संविधान के नष्ट होने की नौबत तक आ गई। अगर मैं अपने निजी अनुभव से कहूं कि अगर गोलमेज सम्मेलन असफल रही, तो वह इन्हीं निष्ठावानों के सैद्धांतिक दृष्टिकोण की वजह से हुई।

महोदय! भारत यूरोप नहीं है। भारत इंग्लैंड नहीं है। इंग्लैंड में जातिप्रथा नहीं है। हमारे यहां है। परिणामस्वरूप, जो राजनैतिक व्यवस्था इंग्लैंड के लिए ठीक है, वह यहां अनुकूल नहीं हो सकती। हमें इस वास्तविकता को समझ लेना चाहिए। महोदय! एक कदम आगे चलकर मैं यह भी कहना चाहूंगा कि भारतीय राजनीति के अन्य छात्र चाहे जो कुछ भी कहें, मैं इसी प्रस्ताव का समर्थन करता हूं कि अगर भारत के संविधान में कुछ भी अच्छा होने जा रहा है, तो वह सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को मान्यता है।

माननीय सदस्यगण : वाह, वाह!

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैंने जो कहा है, उसके लिए मैं शर्मिंदा नहीं हूं। मैं जानता हूं और कह रहा हूं कि यह भारत के संविधान का सबसे श्रेष्ठ हिस्सा बनेगा।