8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 137

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

हम नहीं चाहते कि हमारा अधिकार मात्र मत पेटी में वोट डालने तक सीमित रहे और मुझे पता ही न चले कि हमारा प्रतिनिधि कौन है और हमारा प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई प्रतिनिधि होगा भी या नहीं। हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें न सिर्फ हमारे पास वोट डालने का अधिकार हो, बल्कि यह भी अधिकार हो कि हम अपने वर्ग के लोगों को सदन में लाएं, जो न सिर्फ विचार-विमर्श में, बल्कि निर्णय में हिस्सा भी लें। इसलिए मैं कहता हूं कि सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व कोई खराब चीज नहीं है, यह जहर नहीं है। यह इस देश में विभिन्न वर्गों की सुरक्षा करने के लिए श्रेष्ठ व्यवस्था है। मैं इसे संविधान की विकृति नहीं कहूंगा . . .।

डॉ. एम.के. दीक्षित : सजावट।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : हां, संविधान की सजावट। फिर मेरे माननीय मित्र पूछते हैं कि क्या हम इस सिद्धांत को न्यायपालिका में लागू कर सकते हैं? यदि मेरे माननीय मित्र मुझे विश्वास दिला दें कि वर्तमान न्यायपालिका में सांप्रदायिक आधार पर पक्षपात नहीं होता और एक ब्राह्मण न्यायाधीश जब ब्राह्मण वादी और ब्राह्मण प्रतिवादी के बीच निर्णय देने बैठता है, वह केवल न्यायाधीश की तरह फैसला करता है, तो शायद मैं उनके प्रस्ताव का समर्थन करूंगा। पर मैं जानता हूं कि हमारे यहां किस प्रकार की न्यायपालिका है। अगर मेरे माननीय मित्र और इस सदन के सदस्यों में धैर्य है, तो मैं अनेक ऐसी कहानियां सुना सकता हूं कि न्यायपालिका ने अपनी स्थिति का दुरुपयोग किया है और अनैतिकता बरती है (ठहाका)।

यह इसलिए है, क्योंकि हमें विश्वास नहीं है कि जिन्हें हम ग्रामवासी कहते हैं, जो एक-दूसरे से खून के रिश्ते से बंधे हैं, जो मित्रता तथा पारिवारिक संबंधों से जुड़े हुए हैं, वे राजनैतिक व न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करके अन्य वर्गों को नीचा दिखाने के लिए षड्यंत्र नहीं रचेंगे। ऐसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए हमें यह प्रावधान चाहिए।

महोदय! मुझे कोई संदेह नहीं है कि संविधान का यह एक बेहतर प्रावधान है और मैं दिल से अपने माननीय मित्र श्री मिट्ठा द्वारा रखे गए संशोधन का समर्थन करता हूं।

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राव बहादुर आर.आर. काले’ : महोदय! अब तो मैं इस प्रेसिडेंसी की न्यायपालिका के संदर्भ में अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर की टिप्पणियो पर आपत्ति करता हूं। उनकी इस बात से मुझे दुःख हुआ है कि उन्होंने हमारी न्यायपालिका की सदाशयता और सहजता पर संदेह किया है, जिसे प्रिवी काउंसिल तक ने जब मामला ट्रिब्यूनल में गया था, सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित किया था। . . . उच्चतम ट्रिब्यूनल, यानी प्रिवी काउंसिल ने समय-समय पर दिए गए अपने निर्णयों में इसे संपूर्ण विश्व की

* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 37, पृ. 326-27, 10 फरवरी 1933