ग्राम पंचायत विधेयक
सर्वश्रेष्ठ न्यायपालिका कहा है।
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एक माननीय सदस्य : पूरे विश्व की?
राव बहादुर आर.आर. काले : हां, पूरे विश्व में। मेरा कहना है कि यह निश्चित रूप से एक गंभीर आक्षेप है कि न्यायपालिका सांप्रदायिक भावना से प्रभावित है। जब मैंने यह सुना कि मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर ने यह कहा है कि ‘मैं जानता हूं कि किस तरह की न्यायपालिका हमारे यहां है, जो कि मामले सुलझाने में सांप्रदायिकता के निर्देश पर चलती है’, तो मुझे बहुत दुःख हुआ।
मौलवी सर रफीउद्दीन अहमद : ऐसा किसने कहा था?
राव बहादुर आर.आर. काले : माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर ने।
मौलवी सर रफीउद्दीन अहमद : आपका बहनोई।
राव बहादुर आर.आर. काले : बहनोई से आपका क्या मतलब है? यह मेरे पिता या बेटा भी हो सकते हैं। मैं निश्चित रूप से सदन में किसी के भी द्वारा लगाए गए ऐसे आक्षेप से नफरत करता हूं। वह चाहे मेरा बहनोई हो या पिता या मेरा बेटा, मैं परवाह नहीं करता। इस प्राधिकृत स्थान पर न्यायपालिका की संपूर्ण प्रणाली पर लगाए गए इस आरोप से मुझे बहुत दुःख हुआ है, जबकि वह अपना बचाव करने के लिए यहां उपस्थित नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर को न्यायिक मामलों का कितना अनुभव है। हो सकता है, उन्हें कोई अनुभव हुआ हो, पर मेरा चालीस वर्षों से ज्यादा का अनुभव है, और मैं यह कह सकता हूं कि निचली अदालत से लेकर उच्च अदालत तक, जिसमें उच्च न्यायालय और छोटी अदालतें तक सम्मिलित हैं, मेरे सामने ऐसा कोई मामला नहीं गुजरा है, जहां न्यायाधीश ने मुकदमें का फैसला करते हुए सांप्रदायिकता के आधार पर पक्षपात किया हो। इसलिए मैं अपने माननीय मित्र द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव पर आपत्ति करता हूं। मैं डॉ. अम्बेडकर जैसे विचार रखने वाले व्यक्तियों की मनोवृत्ति को समझ सकता हूं कि क्यों वे ग्राम पीठ में भी विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व चाहते हैं। यह उनकी मानसिकता को दर्शाता है।
श्री एल.आर. गोखले (पूना नगर) : माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर यहां थे और मुझे खेद है कि वह चले गए हैं। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ है कि जब उप न्यायाधीश को इस माननीय सदन में उन्हीं की उपस्थिति में बदनाम किया गया, तो न्यायपालिका से संबंधित विपक्ष के माननीय सदस्यों ने विरोध में एक भी शब्द नहीं कहा।
श्री बी.एस. कामथ : महोदय! उनके मुद्दे पर आने से पहले, मैं यह अवश्य कहना चाहता हूं कि इस तीसरे पहर इस अवसर और क्या विशेष उद्देश्य से उनकी सेवा की मांग की गई थी या यह सुखद इत्तफाक था कि वह इस सदन में आए,
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 37, पृ. 339-40, 11 फरवरी 1993