8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 139

122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मुझे वास्तविकता से कोई मतलब नहीं है, मैं यह मानता हूं कि इस तरह संसदीय कार्यवाही को ध्यान में रखते हुए सदन के दूसरे पक्ष की बात सुने बिना वक्ता का सदन से गायब हो जाना उचित नहीं है, वैसे ही जैसे धूमकेतु क्षितिज से विलीन हो जाता है। यह संसदीय शिष्टता के विरुद्ध और अनुदारता है . . . ।

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राव बहादुर जी.के. चितले’ (जिला अहमदनगर) : (व्यवस्था का प्रश्न उठाते हुए) महोदय! मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर द्वारा ब्राह्मण न्यायपालिका पर वर्ग के रूप में कल लगाया गया आक्षेप एक ऐसा उदाहरण है, जो मैंने इन परिषदों में कभी नहीं देखा, हालांकि वे इन अधिकारों का निष्पादन पिछले 12 वर्षों से कर रही हैं। इन परिस्थितियों में, अगर एक वर्ग की खुली निंदा की जाती है, मैं सोचता हूं कि दूसर पक्ष इस बात पर ध्यान दे कि यह पक्ष अल्पसंख्यक वर्ग से आने वाले प्रत्येक अफसर की निंदा करने पर बल देगा। महोदय! मैं इसलिए सोचता हूं कि इस संदर्भ में एक आधिकारिक आदेश की व्यवस्था देना निहायत आवश्यक है, क्योंकि मुझे सत्ता पक्ष का जिनके हाथों में अपने मातहतों की प्रतिष्ठा निहित है, उनको बिल्कुल चुप बैठे देख दुःख हुआ है।

माननीय श्री आर.डी. बेल : महोदय! . . . इससे पहले कि बहस आगे बढ़े, अगर कोई बहस होनी है तो मुझे लगता है कि सदन को माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर द्वारा कहे सही शब्दों को जानना जरूरी है।

मौलवी सर रफीउद्दीन अहमद : महोदय! चूंकि इस बहस का संबंध माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर की उपस्थिति से है, इसलिए अगर यह बहस तभी हो जब वह यहां हों, तो ज्यादा प्रासंगिक होगी।

माननीय अध्यक्ष : . . . माननीय सदस्य सर रफीउद्दीन अहमद द्वारा दिया गया सुझाव माना नहीं जा सकता, और सदन डॉ. अम्बेडकर के इस सदन में आने का इंतजार नहीं कर सकता। उनका आना बहुत ही अनिश्चित है, इसलिए ऐसा नहीं हो सकता। पर इस बीच मुझे लगता है कि भाषण के सही शब्दों का जानना ठीक होगा और उसके बाद सदन निर्णय करने की बेहतर स्थिति में होगा। (जो कल कहा गया था, उसे पढ़ा गया)।

माननीय श्री आर.डी. बेल : अध्यक्ष महोदय! ऐसा भी तो हो सकता है कि माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर ने अभी तक अपने भाषण की टंकित प्रति न देखी हो और इसलिए आपके और माननीय सदस्य श्री कामथ द्वारा व्यक्त किए गए खेद में पूरी तरह भागीदार नहीं बन सके। उनके समर्थन में हम कह सकते हैं कि वह न कल उपस्थित थे और न ही आज उपस्थित हैं, जिससे उन्हें अपने इन शब्दों की व्याख्या करने का अवसर मिल पाता। फिर वह कैसे सफाई दे सकते हैं कि ‘सरकार’ का