ग्राम पंचायत विधेयक
न्यायपालिका में पूरा विश्वास है।
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माननीय अध्यक्ष : मुझे खुशी है कि सदन के माननीय गृह सदस्य ने अपना वक्तव्य दिया। उनके द्वारा दिए गए वक्तव्य के पश्चात् सदन के पास जानने के लिए कुछ नहीं है।
मैं आगे कहना चाहता हूं कि निश्चित रूप से यह किसी भी विभाग के कार्य के लिए बड़ा आपत्तिजनक, अशोभनीय और अनुचित है। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि उन माननीय सदस्य, जिनका भाषा पर अधिकार है, या सोचते हैं कि उनके पास अभिव्यक्ति की देन है, वे उत्तेजना में आकर किसी क्षण हद से आगे बढ़ जाते हैं और बाद में खाली समय में सोचने पर पछताते हैं। जैसा कि सदन के माननीय सदस्य ने बताया, यह स्पष्ट है कि माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर ने अभी तक अपने वक्तव्य की टंकित प्रति नहीं पढ़ी है। मुझे यकीन है कि अगर वह पढ़ते, तो वह महसूस करते और उन्हें महसूस करना चाहिए, जैसा कि पूरा सदन महसूस कर रहा है। मैं स्वयं इस सदन के माननीय सदस्य को सचेत करना चाहता हूं कि समग्र न्यायपालिका जैसी सम्मानित संस्था की आम निंदा करना बिल्कुल अशोभनीय है। मुझे लगता है कि माननीय सदस्य गलत थे और उठाया गया मुद्दा भविष्य में सदन के मार्गदर्शन के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होगा। मैं सरकारी पक्ष और विपक्ष के सदस्यों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों से सहमत हूं। (तालियां) . . .
III
डॉ. अम्बेडकर का वक्तव्य : अपने भाषण के संदर्भ में *
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मेरे माननीय मित्र श्री मिट्ठा द्वारा प्रस्तावित संशोधन के संदर्भ में शुक्रवार को मैंने अपने भाषण में कुछ टिप्पणियां की थीं, उनकी उपयुक्तता के संबंध में आरोप लगाते हुए मेरे माननीय मित्र राव बहादुर चितले ने पिछले शनिवार को व्यवस्था का प्रश्न उठाया था, उसका स्पष्टीकरण देने के लिए मैं आपकी अनुमति चाहता हूं। महोदय! जब शनिवार को यह मुद्दा उठाया गया था, तभी मैं इसका स्पष्टीकरण देने को उत्सुक था। पर कार्यालय से मुझे अपने भाषण तथा व्यवस्था के प्रश्न पर दिए गए मेरे माननीय सदस्यों के वक्तव्यों की प्रतिलिपियां नहीं प्राप्त हो सकीं। मुझे कार्यालय में बताया गया कि परिषद की बैठक समाप्त होने से पहले मुझे प्रतिलिपि देना संभव नहीं है। परिणामस्वरूप, उस समय मुझे अपना स्पष्टीकरण स्थगित करना पड़ा। मुझे खेद है कि यह जाने बिना ही यह प्रश्न उठा दिया गया है कि अपने भाषण की टंकित प्रति को मैं सही मानता हूं या नहीं। मेरा निवेदन है कि न्याय के बुनियादी नियमों में से एक यह है, मैं अदब के साथ कहना
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 37, पृ. 400-403, 13 फरवरी 1933