8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 141

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

चाहता हूं कि जब तक उन बातों के बारे में पूरी तरह आश्वस्त न हो लिया जाए, कोई निष्कर्ष न निकाला जाए। मुझे अफसोस है कि मुझे इस नियम का लाभ नहीं दिया गया। मेरे माननीय मित्र श्री कामथ द्वारा प्रस्तुत तर्क के आधार पर यह कहा गया कि मुझे इस शिष्टाचार का अधिकार नहीं है, क्योंकि शुक्रवार को भाषण देने के बाद मेरा अचानक चला जाना संसदीय शिष्टाचार के नियमों का उल्लंघन है। सबको हमेशा माननीय सदस्य श्री कामथ से शिष्टाचार सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि जैसा कि हम सब जानते हैं कि वह भारतीय राजनीतिज्ञों की उस प्राचीन उदारवादी श्रेणी के हैं, जिन्होंने संसदीय जीवन व्यतीत करते हुए अपने बाल सफेद कर लिए हैं। इस मामले में मैं यह कहने की हिम्मत करूंगा कि शिष्टाचार के जिस नियम का आधार लिया गया है, वह यहां लागू नहीं होता। अगर मैंने नियमों को ठीक से समझा है, तो उसमें कहा गया है कि सदस्य को भाषण देने के बाद सदन नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि जवाब सुनने का इंतजार करना चाहिए। पर यह तभी लागू होता है, जब भाषण के दौरान सदस्य ने सदन के अन्य सदस्य की व्यक्तिगत रूप से अवमानना की हो। मेरा विचार है कि उस मामले में इसे लागू नहीं किया जा सकता, जहां सदस्य ने सामान्यतः प्रचलित तथ्यों के आधार पर सामान्य तर्क प्रस्तुत किए हों। अगर ऐसा नियम लागू करते हैं तो महोदय, प्रत्येक सदस्य जिसने विचार-विमर्श में भाग लिया हो, उसे प्रश्न पूछे जाने तक उपस्थित रहना चाहिए तथा बहस में प्रत्येक भाषण को सुनना चाहिए। मैंने माननीय सदस्य श्री कामथ को कोई चुनौती नहीं दी, या सदन के किसी माननीय सदस्य से कोई प्रश्न नहीं पूछे थे। मेरे लिए जवाब में सुनने को कुछ नहीं था, इसलिए मैं बैठने को बाध्य नहीं था और मुझे एक महत्त्वपूर्ण कार्य निबटाना था। बिना सुनवाई के दोषी नहीं ठहराने के नियम का लाभ मुझे न मिलने का दूसरा कारण यह भी है कि मैं पूर्ण-कालिक सदस्य नहीं हूं तथा किसी को भी निश्चित रूप से यह पता नहीं है कि कब मैं उपस्थित होऊंगा। मैं व्यवस्था के प्रश्न पर व्यक्त विचार का आदर करता हूं। मैं मानता हूं कि शायद मैं अपनी अनुपस्थिति की अनियमितता में ज्यादा नियमित हूं, यद्यपि उपयोगिता के मापदंड के अनुसार मैं अवश्य कहूंगा कि इस सदन का सदस्य होने के नाते जो भी कार्य करने के लिए मैं काबिल हूं, चाहे अंदर या बाहर, वह सममूल्यता के नीचे नहीं गिरेगा। चाहे मैं नियमित हूं या अनियमित, मुद्दा यह नहीं है। मेरे विचार में मुद्दा यह है कि माननीय सदस्य ने मामले को तभी क्यों नहीं उठाया था, जब मैं बोल रहा था? अगर मैं व्यवस्था का प्रश्न उठाने की प्रक्रिया को सही ढंग से समझता हूं, तो प्रक्रिया यह होनी चाहिए कि जो सदस्य शिकायत करना चाहता है, वह तभी अध्यक्ष का ध्यान उस ओर आकर्षित करे, जब कि व्यवस्था का कथित उल्लंघन हो रहा हो। इसलिए मुझे यह बड़ा अजीब लगता है कि उस समय आहत पक्ष ने कुछ नहीं किया, एक रात सोचा और बिना नोटिस के अगली सुबह अपना दुःख व्यक्त किया और फिर शिकायत की कि दोषी कठघरे में उपस्थित नहीं है। उचित प्रक्रिया यह