ग्राम पंचायत विधेयक
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होती कि जब मैं बोल रहा था, तभी उन्होंने तुरंत व्यवस्था का प्रश्न उठाया होता, या बिना पक्षपात के कहें तो उनको नोटिस देना चाहिए था।
व्यवस्था के प्रश्न के सार के सदंर्भ में, मैं चाहता हूं कि मैंने जो कहा है कि टंकित प्रति को मैं सही रिकॉर्ड के रूप में स्वीकार नहीं करता, उसके अनुसार तो यह लगता है कि जैसे मैंने संपूर्ण न्यायपालिका पर बड़े पैमाने पर इल्जाम लगाया है, जो निश्चित रूप से न तो मेरी इच्छा थी, न ही मेरा उद्देश्य। प्रतिलिपि में लिखा है :
एक ब्राह्मण न्यायाधीश जब एक ब्राह्मण वादी और ब्राह्मण प्रतिवादी के बीच
मामला सुलझाने के लिए निर्णय करने बैठता है, तो वह मात्र न्यायाधीश की
तरह निर्णय करता है . . .।
यह सही नहीं है, मैं इस मामले की बात नहीं कर रहा था, जिसके झगड़े में ब्राह्मण भागीदार थे। मैं उस मामले की बात कर रहा था, जहां वादी, प्रतिवादी ब्राह्मण व गैर-ब्राह्मण थे। फिर ‘बिना सांप्रदायिक पक्षपात के’ शब्दों के बाद ‘केवल न्यायाधीश की तरह निर्णय करते हैं’ छूट गया है। जो महत्त्वपूर्ण शब्द मैंने अर्थ को सीमित करने के लिए प्रयोग किए थे, वे इस वाक्य ‘न्यायपालिका ने अपनी प्रतिष्ठा का हनन किया और दुरुपोग किया है’ में से छूट गए हैं।
इस सुधार से यह प्रमाणित हो जाएगा कि समग्र न्यायपालिका की निंदा करने का मेरा कोई इरादा न था, न ही मैं उसके समग्र आचरण पर कोई निर्णय देना चाहता था। दूसरे, न्यायिक सेवा में ब्राह्मणों के ऊपर प्रतिकूल टिप्पणी करने का भी मेरा कोई इरादा न था। वास्तव में, मैं यह कहना चाहता हूं कि जब मैंने ब्राह्मण न्यायपालिका का उल्लेख किया, तो मेरा आशय उनकी विशेष निंदा के लिए नहीं था। मैंने तो मुद्दे को सामान्य रूप से उठाया था और ब्राह्मणों का उदाहरण स्पष्टीकरण के लिए दिया था। यह इस तथ्य से प्रमाणित हो जाता है कि अपने भाषण के अंत में उसके गठन में किसी भी तत्त्व को विशिष्ट माने बिना मैंने न्यायपालिका का सामान्य रूप में जिक्र किया था। इसलिए जो तर्क मैं कर रहा था, उसके लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि मेरा समग्र न्यायपालिका की निंदा करना या विशेष अभिज्ञान के लिए किसी विशेष तथ्य को अलग कर देना, नितांत अनावश्यक था। माननीय सदस्य राव बहादुर चितले द्वारा उठाए गए मुद्दे का मैं जवाब दे रहा था कि न्यायपालिका का सांप्रदायिक झुकाव है या नहीं। मेरा उनको जवाब यह था कि सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत हम रहते हैं, उसके परिणामस्वरूप सांप्रदायिक झुकाव आवश्यक है। मैंने स्पष्टीकरण के रूप में ब्राह्मण न्यायाधीश की बात कही है, क्योंकि मैं एक प्रतिपक्षी को जवाब दे रहा था, जो संयोगवश ब्राह्मण था। अगर मेरा प्रतिपक्षी गैर-ब्राह्मण या मुसलमान होता, तो मैं उनका उदाहरण देने में नहीं हिचकिचाता। महोदय! मैं नहीं जानता कि क्या आप उस वक्तव्य को, जो आरोप लगाता है कि न्यायपालिका सांप्रदायिक मामलों में सांप्रदायिक झुकाव दर्शाती है, अनुचित कहेंगे। इसका निर्णय मैं आप और इस सदन पर छोड़ता हूं। मैं यही कहना चाहता हूं कि इस आधार को भारतीय दंड विधान