8. ग्राम पंचायत विधेयक - Page 143

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

संहिता तक ने मान्यता दी है। हमारे यहां भारतीय दंड विधान संहिता के अंतर्गत एक धारा है, जो किसी वादी-प्रतिवादी को यह अनुमति देती है कि वह अपने केस को (दूसरी कचहरी में) स्थानांतरण के लिए मांग करने की इस आधार पर अनुमति देती है, कि वह न्यायाधीश पक्षपाती है। हमारे यहां भारतीय दंड विधान संहिता में यह प्रावधान है, जिसके अंतर्गत एक न्यायाधीश को उस मामले को जिसमें उसका अपना स्वार्थ होता है, निबटाने से रोका जा सकता है। दूसरे, यह दृष्टिकोण कि न्यायपालिका पक्षपाती है, वह सांप्रदायिक आचरण के मुद्दे पर सांप्रदायिक पक्षपात प्रदर्शित करेगी, इसे विधेयक में भी मान्यता दी गई है। अधिकांश माननीय सदस्यो को यह याद होगा कि विधेयक मूल रूप से इस सिद्धांत पर आधारित है कि संपूर्ण ग्राम पीठ निर्वाचित पंचायत होनी चाहिए। प्रथम वाचन में मैंने अनुरोध किया था कि प्रतिबद्ध न्यायपालिका के गठन को इस सिद्धांत पर आधारित करना उचित नहीं है और मुझे लगता है कि उसकी प्रतिक्रियास्वरूप न्यायपालिका के उस भाग में परिवर्तन की व्यवस्था की गई। महोदय! मैं उसे सांप्रदायिक झुकाव के अस्तित्व का प्रमाण मानता हूं। अंत में, जिन्होंने व्यवस्था का मुद्दा उठाया है, उन्होंने भी व्यवस्था के प्रश्न पर अपने भाषण में मैंने जो कहा, उसको मान्यता दी है। उन्होंने इन अनिष्टकारी शब्दों में माननीय गृह सदस्य को धमकी दी है : ‘अगर माननीय गृह सदस्य मेरा

खंडन नहीं करते हैं’, तो माननीय सदस्य अल्पसंख्यक के हर अधिकारी पर आक्रमण करना आवश्यक समझेंगे। ऐसी कारगुजारी उस वक्त तक संभव नहीं है, जब तक कि उन्हें मेरे द्वारा उल्लिखित तथ्यों के अस्तित्व में विश्वास न हो। मेरे माननीय मित्र को जिस बात ने दुःख पहुंचाया है, वह मुख्य मुद्दा नहीं था, बल्कि एक उदाहरण को लेकर झमेला किया गया। अगर मैंने अपनी बात मुसलमान या गैर-ब्राह्मण का उदाहरण देते हुए की होती, तो व्यवस्था का प्रश्न नहीं उठाया जाता, संभवतया मुक्त कंठ से मेरी प्रशंसा की जाती। बस यही मुझे कहना है।

13 फरवरी 1933 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा वक्तव्य के बाद, माननीय अध्यक्ष ने अम्बेडकर के भाषण में निहित आलोचना का स्पष्टीकरण किया, परिषद में शिष्टाचार व भाषण के गुणावगुण पर विवेचन किया और अंत में कहा :

मुझे इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहना है। माननीय सदस्य द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण स्वीकार कर लेना चाहिए, कि उनका अभिप्राय संपूर्ण न्यायपालिका की निंदा करना नहीं था, बल्कि वह यह कहने का प्रयास कर रहे थे कि ऐसी घटनाएं घटी हैं, जब न्यायपालिका में सांप्रदायिकता के आधार पर पक्षपात होते देखा गया है।

IV *

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! क्या आप स्पष्ट करेंगे? आपने जो कहा मेरी समझ में नहीं आया है। मुझे आपकी यह बात तो समझ में आई है कि विधेयक के तीसरे वाचन के समय माननीय सदस्य उसका उस मुद्दे पर विरोध नहीं कर सकते,