ग्राम पंचायत विधेयक
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जिसको पहले उठाया ही नहीं गया था, या दूसरे वाचन के समय उस मुद्दे पर विधेयक को अस्वीकार कर दिया हो। क्या मैं सही हूं? अगर मुद्दा दूसरे वाचन में न लिया गया हो या किसी एक मुद्दे पर दूसरे वाचन के दौरान कोई एक सदस्य या विपक्ष सदन में हार जाए, तो वही विपक्ष उसी प्रश्न पर विधेयक के तीसरे वाचन का विरोध नहीं कर सकता है। महोदय! क्या यह ठीक है?
माननीय अध्यक्ष : नहीं, नहीं! कुछ दिन पहले इस सत्र में जब पहली बार अवसर आया, मैंने अपना निर्णय दिया था। तब माननीय सदस्य उपस्थित नहीं थे। मैं उनके लिए दोहराऊंगा। माननीय सदस्य एक संवैधानिक वकील होने के नाते, अच्छी तरह से जानते हैं कि एक विधेयक का वाचन तीन बार होता है। विधेयक की पहली अवस्था में, यानी प्रथम वाचन में उसके सिद्धांतों पर विचार-विमर्श होता है। उसके बाद अगर विधेयक को प्रवर समिति के सुपुर्द किया जाता है, तो प्रवर समिति की स्वीकृति के पश्चात् सदन विधेयक की आलोचना करने की स्थिति में होता है और अगर इसे प्रवर समिति को नहीं सौंपा जाता है, तब दूसरे वाचन के दौरान विधेयक को खंड-प्रतिखंड परखा जाता है तब संशोधन किए जाते हैं। माननीय सदस्य जो कुछ भी कहना चाहते हैं, वह इस वाचन के दौरान कर सकते हैं। सदन में अन्य माननीय सदस्यों की तरह माननीय सदस्य भी हो सकते हैं, जो शायद विधेयक के दूसरे वाचन के दौरान उपस्थित नहीं थे। वह अब तीसरे वाचन के दौरान आते हैं। वह विधेयक का विरोध कर सकते हैं, जब विधेयक पहले वाचन से दूसरे वाचन में आता है, और खंड-प्रतिखंड निरीक्षण करने की अवस्था में उसका स्वरूप बदल जाता है। तब माननीय सदस्य तीसरी अवस्था में तीसरे वाचन पर उन विशेषताओं पर उंगली उठाते हुए, जो दूसरे वाचन के दौरान शामिल की गई थीं और जो उन्हें आपत्तिजनक लगीं, उन पर आपत्ति कर सकते हैं। बस यही मेरा निर्णय है, मैं किसी भी माननीय सदस्य को तीसरे वाचन में विरोध करने से नहीं रोकता हूं। हम माननीय सदस्य राव साहब कुलकर्णी का उदाहरण लें। उन्होंने कई संशोधन प्रस्तुत किए थे, जिन्हें स्वीकृत नहीं किया गया और उन्होंने उन्हीं आधारों पर फिर से तीसरे वाचन का विरोध किया है। उनका कहना है कि वह विधेयक का इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि वह अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं करता है और उन्होंने जो संशोधन प्रस्तुत किए, उन्हें स्वीकृत नहीं किया गया अथवा उन पर विचार नहीं किया गया और उन्होंने अब तीसरे वाचन में उसका विरोध किया है, क्योंकि यह उनके दृष्टिकोण से संतोषजनक नहीं है। इसी तरह चाहे किसी माननीय सदस्य ने कोई संशोधन प्रस्तुत किया हो या नहीं, वह तीसरे वाचन में उसका विरोध कर सकते हैं, लेकिन उन्हें दूसरे वाचन में किए गए परिवर्तन या नहीं किए गए परिवर्तनों तक अपने को सीमित रखना होगा और वह पहले वाचन पर न जाएं तथा सामान्य सिद्धांतों के संबंध में बार-बार उन
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 37, पृ. 2197-98, 24 मार्च 1933