128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
तर्कों को न दें जिनके लिए उचित समय पहला वाचन था।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मेरा मानना है कि आपकी टिप्पणियां तर्कों के इस्तेमाल तक सीमित हैं, मुद्दों पर नहीं। मैं इसी बात को अलग ढंग से पेश करता हूं। मैं अपना ही उदाहरण देता हूं। मैं कुछ सिद्धांतों पर विधेयक का विरोध करता हूं। मेरा मानना है कि जिन सिद्धांतों पर यह विधेयक आधारित है, वह गलत है और यह सदन जिसने बहुमत से विधेयक को स्वीकार किया है, वह मेरे विरुद्ध है और उन सभी माननीय सदस्यों के विरुद्ध है, जिनका दृष्टिकोण मेरे जैसा है। क्या मैं इस विधेयक के तीसरे वाचन का विरोध करने का हकदार नहीं हूं, क्योंकि मैंने पहले वाचन में जिन सिद्धांतों का विरोध किया था, वे विधेयक में मौजूद हैं?
माननीय अध्यक्ष : नहीं, यह मेरा निर्णय नहीं है। माननीय सदस्य ऐसा नहीं कर सकते और उन्हें इसका अधिकार भी नहीं है, क्योंकि उनके पास तीसरे वाचन से पहले ऐसा करने का अवसर था।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मान लीजिए, तर्क को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए, मेरे संशोधन विधेयक के दूसरे वाचन में रद्द कर दिए जाते हैं, और सदन में विधेयक को उसके मूल सिद्धांतों के साथ स्वीकार कर लिया जाता है तो क्या मुझे विधेयक के तीसरे वाचन का विरोध करने का अधिकार नहीं मिलता है? इस आधार पर कि जिन प्रावधानों का मैंने विरोध किया अब तक इसमें मौजूद हैं?
माननीय अध्यक्ष : नहीं, मैं अपने निर्णय पर अडिग हूं। वह ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि सदन के समक्ष उन्होंने अपने विचार रखे और बहुमत ने उनके विरुद्ध निर्णय लिया। अब हम तीसरे वाचन की अवस्था में हैं। वरना तीनों अवस्थाओं का कोई महत्त्व नहीं रहता।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! आपके निर्णय के पश्चात् अल्पसंख्यकों के पास, जिन्होंने प्रत्येक अवस्था में विधेयक का विरोध किया है, यही विकल्प है कि वे इसके विरुद्ध मत दें, अन्यथा अगर बहुमत यह निर्णय करेगा कि यह विधेयक अच्छा है और अल्पसंख्यक उसका विरोध करेगा, तो अल्पसंख्यकों के पास अपनी आपत्ति को दर्ज करने का कोई अवसर न होगा।
माननीय अध्यक्ष : यह बिल्कुल सही है। अल्पसंख्यकों को तीसरे वाचन के दौरान विधेयक के विरुद्ध मत देने का अधिकार है। वे मत विभाजन करा सकते हैं और इसके विरुद्ध मत दर्ज कर सकते हैं। लेकिन प्रथम वाचन में नीतिगत मामलों पर बहस करना गलत होगा।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! बिल्कुल सही। आपका कथन इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता है कि हमारे अधिकारों पर रोक लगाई जाती है।
माननीय अध्यक्ष : नहीं, यह ठीक है।