9. स्थानीय बोर्ड अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 146

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स्थानीय बोर्ड अधिनियम-

संशोधन विधेयक *

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डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर) : अध्यक्ष महोदय! पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद मैं पृथक निर्वाचन के मामले पर विचार-विमर्श करने के लायक नहीं रहा हूं। इसलिए, मैं विधेयक के उस भाग के बारे में कुछ नहीं कहूंगा, जिसका संबंध विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने से है और जिसके लिए इस विधेयक में प्रावधान रखा गया है। संभवतः मेरे लिए इस बात का उल्लेख करना उचित होगा कि संयुक्त बनाम पृथक निर्वाचन के इस जटिल प्रश्न को मैं किस नजरिए से देखता हूं। महोदय! मैं इसे इस ढंग से देखता हूं कि यदि विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए संयुक्त निर्वाचन प्रणाली लागू की जाती है, तो इसका क्या प्रभाव होगा। मेरे विचार से यह होगा कि पांच वर्षों में चुनाव के समय एक दिन हिन्दू और मुसलमान सामूहिक रूप से मतदान केंद्र पर जाएंगे। मुझे नहीं पता कि संयुक्त निर्वाचन के परिणामस्वरूप इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है। (व्यवधान)। कृपया, मुझे पांच वर्षों की शेष अवधि के बारे में अपनी बात कहने दें। उदाहरण के तौर पर, मैं कह सकता हूं कि चुनाव के दिन के अलावा मुसलमान पृथक जीवन बिताने में विश्वास करेंगे, अपने आपमें सीमित समाज के रूप में। मुझे नहीं लगता है कि संयुक्त निर्वाचन के परिणामस्वरूप, मुसलमान और हिन्दू एक ही चाल में इकट्ठा रहने लगेंगे। मैं नहीं समझता हूं कि संयुक्त निर्वाचन के परिणामस्वरूप मुसलमानों और हिन्दुओं के अंतर्जातीय विवाह होने लगेंगे। मैं नहीं मानता हूं कि संयुक्त निर्वाचन के परिणामस्वरूप, हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ भोजन करेंगे। महोदय! ऐसी स्थिति में मेरा सुविचारित मत है कि अगर हम एकता स्थापित करना चाहते हैं, तो यह काम किसी एक दिन को तय करने से नहीं होगा, चाहे वह दिन कितना ही पवित्र क्यों न हो, जब हिन्दू और मुसलमान, दोनों एक ही मतदान केंद्र पर जाएंगे। अगर हम वास्तव में एकता स्थापित करने के तरीके ढूंढना चाहते हैं, तो हमें सामाजिक बंधनों को तोड़ देना होगा। मैं यह

* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 2, पृ. 326-29, 18 जनवरी 1938