130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कहना चाहता हूं कि इस मामले में हिन्दू समुदाय को पहल करनी होगी, क्योंकि वह एक बहुत ही गैर-मिलनसार समुदाय है। अगर अन्य समुदाय पृथक जीवन बिताते हैं, तो इसके लिए हिन्दू समुदाय पूरी तरह इसलिए दोषी है, क्योंकि वह निर्दिष्ट हितों को अपने ही हित समझता है। इसलिए मैं यह विचारपूर्वक कहता हूं कि इस समस्या के निदान के लिए ऐसी योजना प्रस्तुत करने का कोई महत्त्व नहीं है, जो प्रभावहीन है और पांच या तीन वर्षों के अंतराल में केवल एक दिन के लिए लागू हो। इसके परिणामस्वरूप कुछ नहीं होगा और न ही इससे कोई लाभ प्राप्त होगा। आप इसे प्रयोग के तौर पर कर सकते हैं। मैं अपने मुसलमान भाइयों से प्रार्थना करता हूं कि वे उनको यह मौका दें और देखें कि कोई विशेष सुरक्षा दोनों समुदायों को अलग न रहने का अवसर प्रदान करती है या नहीं। पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने के कारण मैं पृथक निर्वाचन का समर्थन नहीं कर सकता हूं।
अब मैं विधेयक के दूसरे पहलू को लेता हूं और यह कहकर अपनी बात शुरू करता हूं कि विधेयक जिस रूप में पेश किया गया है, हमारी वर्तमन स्थिति से निश्चित रूप से एक कदम आगे है। लेकिन इस विधेयक में कुछ विशेष नहीं है। यह निरर्थक है और इसमें कुछ भी तो नहीं है, सिवाए इसके कि मंत्री महोदय ने अपने भाषण के दौरान बताया है कि स्थानीय निकायों को पुनर्गठित करने के संबंध में वह क्या करना चाहते हैं, विधेयक जिस रूप में प्रस्तुत किया गया है, उससे अवश्य ही हमें कुछ भी जानकारी नहीं मिलती है। विधेयक में सिर्फ इतना ही कहा गया है कि सरकार को इस या उस काम के लिए नियम बनाने के अधिकार दिए जाएं। इसके अलावा, विधेयक में और है क्या? अगर इस विधेयक के साथ उद्देश्यों व कारणों का विवरण संलग्न नहीं होता, तो हमें यह भी पता नहीं चलता कि विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सरकार किन सिद्धांतों को अपना रही है। मैं सोच समझकर कह रहा हूं कि ये संवैधानिक प्रश्न हैं। यह सामान्य विधान को लागू करने का प्रश्न नहीं है, जैसा कि इस समय परिपाटी बन गई है और जो नितांत पाखंडपूर्ण है कि सरकार को नियमों द्वारा नीति को क्रियान्वित करने के लिए स्वीकृति दी जानी चाहिए। हम सरकार को कुछ करने के लिए अपने हिस्से के अधिकार सौंप रहे हैं। हम उन्हें कराधान संबंधी कुछ अधिकार दे रहे हैं। हम उन्हें निर्वाचित प्रतिनिधित्व देने का अधिकार सौंप रहे हैं। मैं पूर्ण रूप से विचार करने के पश्चात् निवेदन करता हूं कि यह संवैधानिक प्रश्न है और इसलिए इसका ब्यौरेवार समाधान इस सदन में ही होना चाहिए। इसे कार्यपालिका की इच्छा पर नहीं छोड़ना चाहिए। भारत सरकार अधिनियम का ही उदाहरण लें। इस विधेयक में क्या समाहित है? यह विधेयक मताधिकार पर विचार करता है। यह उन समुदायों की बात करता है, जिन्हें प्रतिनिधित्व मिलना है। यह निर्वाचन-क्षेत्रों और मतदान के तरीकों की बात करता है। भारत सरकार अधिनियम को देखें। वह क्या कहता है? क्या उसने