स्थानीय बोर्ड अधिनियम-संशोधन विधेयक
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के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का है, बल्कि इस अभिव्यक्ति को मान्यता देने की इच्छा है जो लंबे समय से प्रचलन में है। मैं उनसे निवेदन करता हूं कि वह यह न समझें कि ‘हरिजन’ शब्द या उनकी परिभाषा में उनके संप्रदाय की अवमानना करने का प्रयास किया गया है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! जैसा कि आपने आदेश दिया है कि यह अवसर भाषण देने के लिए नहीं है, मैं कोई भाषण नहीं दूंगा। मैं सिर्फ यही कहूंगा कि मैं किसी बेहतर नाम का सुझाव देने की स्थिति में नहीं हूं, लेकिन मैं यह अवश्य कहूंगा कि अब व्यावहारिक रूप से ‘हरिजन’ शब्द ‘अस्पृश्य’ शब्द का पर्यायवाची बन गया है, इसके अतिरिक्त इस नाम में और कुछ नहीं है, और मैं मानता हूं कि अगर माननीय प्रधानमंत्री हमारी तरह से ही सोचते हैं कि ‘हरिजन’ शब्द की अभिव्यक्ति ‘अछूत वर्ग’ के समान बन गई है, तब यह उनका कर्तव्य हो जाता था कि वह उस समय इस शब्द को वापस ले लेते और बाद में किसी वैकल्पिक नाम को ढूंढने के दृष्टिकोण से हमसे इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करते। उनके तर्कों से हमें कोई विश्वास प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए मैं इस सदन से जाता हूं।
(डॉ. भीमराव अम्बेडकर और स्वतंत्र लेबर पार्टी के अन्य सदस्य सदन से चले जाते हैं।)