10. छोटे किसान राहत विधेयक - Page 161

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अहितकारी नियम के अंतर्गत आता है, तो मेरे लिए बहस करना बेकार है। भारत सरकार अधिनियम की धारा 299 की उपधारा (3) को पढ़कर मुझे ऐसा लगता है कि विधेयक तब तक स्थगित रखना पड़ेगा, जब तक कि यह व्यथित सदस्य को सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान पर बहस करने से रोकता है। यह समूचे मुद्दे को खटाई में डालने की बात है। अगर मुझे अवसर दिया जाता है तो मैं स्पष्ट कर दूं कि यह कैसे किया जा रहा है। मैंने इस पर काफी विचार किया है। न तो यह विधेयक और न ही मेरे माननीय मित्र श्री पारूलेकर या मेरी पार्टी के सदस्यों द्वारा लाया गया संशोधन धारा 299 की उपधारा (3) की शर्तों के अंतर्गत आते हैं। अगर आप मुझे अनुमति देंगे, तो मैं इसे दो मिनट में बता दूंगा।

माननीय अध्यक्ष : जहां तक वैयक्तिक संशोधन का सवाल है, मैंने इस पर एक निर्णय दे दिया है। अब, अगर किसी विशेष संशोधन या इसके संबंध में मैंने जो निर्णय दिया है, उसका उल्लेख किए बिना माननीय सदस्य यह कहना चाहते हैं कि समूचा विधेयक धारा 299 की सीमा में नहीं आता है, तो यह एक अलग मुद्दा होगा। मैं इस मुद्दे पर उनको बोलने का अवसर देने को तैयार हूं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं आपका कृतज्ञ हूं। जैसा कि मैं कह रहा था, यह विधेयक एक ऐसा विधेयक है, जिसे केवल समाधान का उपाय कहा जा सकता है। कोई व्यक्ति अदालत से आदेश प्राप्त कर सकता है। इस आदेश का मतलब है कि किसी आदमी के खिलाफ उसके कुछ अधिकार हैं। यह विधेयक जो कुछ कहता है, वह यह है कि उस व्यक्ति ने किसी ऋणदाता या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ आदेश के परिणामस्वरूप जो भी अधिकार प्राप्त किए हों, वे अधिकार एक निश्चित दिन तक प्रभाव में नहीं आ सकते, यानी 31 मार्च 1939 तक। मैं समझता हूं कि विधेयक का सार यही है। इसलिए यह उपाय अधिकारों को क्रियान्व्ति करने के संबंध में है, इसका अधिकारों को संशोधित या समाप्त करने से कोई संबंध नहीं है। यह मेरा पहला निवेदन है। मैं किसी व्यक्ति को प्राप्त अधिकार की समाप्ति अथवा उसमें संशोधन और उस अधिकार को लागू करने में देर या उसके स्थगित करने के बीच में अंतर करूंगा।

दूसरे, धारा 299 की उपधारा (3) भूमि के अधिकारों की समाप्ति अथवा संशोधन से ही संबंध रखती है। इस विधेयक का मकसद केवल जमीन के अधिकारों को लागू करने तक सीमित नहीं है। इसका संबंध कर्ज और बेदखली से भी है।

जिस अंतर की मैं बात कर रहा हूं, उसका अर्थ है कि अधिकारों का कार्यान्वयन स्थगित करना एक बात है और उसकी समाप्ति या संशोधन दूसरी। विधेयक का उद्देश्य केवल इतना है कि किसी पक्ष ने यदि अदालत से फैसला ले लिया है, तो उसे स्थगित रखा जाए। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि जमीन का अधिकार समाप्त कर दिया जाए या उसमें संशोधन कर दिया जाए। अतः मेरा निवेदन है कि