बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक
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या शांति भंग को रोकने के लिए अत्यावश्यक माने जाते हैं या वह अपने आपको
ऐसे स्थान/स्थानों पर ऐसे मार्ग/मार्गों से निश्चित समय तक हट जाएगा, जैसा
पुलिस आयुक्त ठीक समझे।
(4) पुलिस आयुक्त के द्वारा दिए गए आदेश से परेशान व्यक्ति खंड (3) के
तहत इस आदेश के जारी होने के दस दिनों के अंदर प्रेसिडेंसी की सरकार
को अपील कर सकता है।
(5) खंड (4) के तहत अपील के परिणाम तक, ख्ांड (3) के तहत पुलिस आयुक्त
का आदेश निर्णयात्मक होगा।
(6) इस धारा में कोई व्यवस्था नहीं है कि कोई पुलिस अधिकारी इस बात के
लिए बाध्य हो कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध उसने ख्ांड (3) के अंतर्गत कार्रवाई
की है, उसे या अदालत को यह बताना जरूरी हो कि उसकी सूचना का स्रोत
क्या है या सूचना के तत्त्व क्या हैं? यदि पुलिस आयुक्त को यह अंदेशा हो कि
सूचना देने वाले का नाम या पता खुल जाएगा।
(7) खंड (3) के अंतर्गत पुलिस आयुक्त का खंड (4) के तहत प्रेसिडेंसी की
सरकार द्वारा दिया गया कोई आदेश आपातकाल की घोषणा के लागू रहने की
समाप्ति के बाद प्रभावी नहीं रहेगा।
उपरोक्त खंड (2) के बाद निम्नांकित उपखंड जोड़ा जाएगा, यथा (3) उप-धारा
(3) में शब्दों, कोष्ठकों, खंड और अक्षर ‘या (2क)’ के लिए, यह विकल्प दिया
जाना चाहिए, यथा
‘(2क) या (2ग)’
प्रश्न प्रस्तावित
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर * ः महोदय! इससे पहले कि मैं अपने प्रस्तावित संशोधन की विशेषताएं बताऊं, मैं समझता हूं कि यह उचित होगा यदि मैं सदन को संशोधन की आवश्यकता बताऊं। माननीय गृह मंत्री ने विधेयक को प्रस्तावित करते हुए कहा है कि बंबई नगर और इसके नागरिक उन कुछ अवांछित तत्त्वों के शिकार हैं, जो समाज के कमजोर वर्गों को आतंकित और आहत करते हैं, और कमजेर वर्गों में इन खतरनाक लोगों के खिलाफ अदालत में जाने और इनके लिए सजा का आदेश प्राप्त करने के लिए न तो दृढ़ निश्चय और न ही इच्छा है और परिणामस्वरूप वह समझते हैं कि पुलिस आयुक्त को उन लोगों के हित में जो इन खतरनाक तत्त्वों के द्वारा पीडि़त हैं, अधिकार देना है ताकि वह इन तत्त्वों के खिलाफ कार्रवाई कर सकें। महोदय, उन्होंने जो कहा है, उससे मैं सहज ही सहमत हूं कि उन्होंने जिस
खतरे का उल्लेख किया है, वह यथार्थ है।
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 2471-73, 27 अप्रैल, 1936