बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक
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पश्चात् प्रवृत्त नहीं रहेगा, परंतु यह उन प्रसंगों के संबंध में प्रभावी नहीं रहेगा,
जो उक्त अवधि के भीतर हो पाए हों या होने के लिए छोड़ दिए गए हों।
इसलिए सदन से मेरा निवेदन है कि ‘डिफेंस ऑफ रेल्म एक्ट’ और ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ तथा धारा 102 के प्रावधानों को मद्देनजर रखते हुए हम वास्तव में कुछ भी असामान्य नहीं कर रहे हैं।
एक टिप्पणी जो मेरे माननीय मित्र श्री जमनादास मेहता ने की वह यह है कि यद्यपि मेरी इच्छा इन आपातकालीन अधिकारों को सांप्रदायिक झगड़ों और सांप्रदायिक दंगों तक सीमित करना थी, तथापि इस संशोधन में प्रयुक्त भाषा ऐसी नहीं है, जो अंत में इस संशोधन के कार्यान्वयन को सांप्रदायिक दंगों तक सीमित रख सकेगी। उनका तर्क यह था कि ‘संप्रदाय’ शब्द का अनिवार्य मतलब धार्मिक संप्रदाय ही नहीं होता और इसका प्रयोग व्यावसायिक संप्रदाय, औद्योगिक संप्रदाय और श्रमिक संप्रदाय के रूप में होता है और दूसरे, सरकार अपने अधिकारों का उपयोग इस विधान को श्रमिक विवादों के संबंध में भी करेगी।
अब, इस मुद्दे पर मेरा पहला निवेदन यह है कि घोषणा का यह हिस्सा निश्चित रूप से व्याख्या का विषय नहीं होने जा रहा है, क्योंकि यह सरकार के स्व-विवेक के आधार पर तय होने वाला मामला है। इसे किसी अदालत में नहीं ले जाया जा रहा और आपातकालीन घोषणा अदालत में कोई मसला नहीं बन सकती कि यह उचित रूप में लागू हुई है या नहीं। अदालत का काम तो केवल यह देखना है कि क्या घोषणा जारी हो गई है या नहीं, यह घोषणा उचित रूप से जारी हो गई है या नहीं — यह सरकार का मामला है और अगर सरकार ने घोषणा का उपयोग ऐसे ढंग से किया है, जैसा कि मेरा अथवा विपक्ष के किसी सदस्य का इरादा नहीं था, तो यह सरकार इस सदन के समक्ष उत्तरदायी रहेगी।
जिस दूसरी बात का मैं निवेदन करना चाहता हूं वह यह है कि मैं स्वीकार करता हूं कि ‘कम्यूनिटी’ शब्द का व्यापक अर्थ में प्रयोग हुआ है लेकिन यहां आने से पहले मैंने अपने आपको संतुष्ट करने के लिए ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी को देखा, क्योंकि मैं श्री जमनादास जी से ज्यादा चिंतित हूं कि यह उपाय श्रमिक झगड़ों में लागू नहीं होना चाहिए।
जमनादास एम. मेहता : बस, इतने ही चिंतित, ज्यादा नहीं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अगर आप मुझे कहने की अनुमति देंगे, तो मैं ज्यादा चिंतित हूं। इसलिए मैं कहता हूं कि यदि आप बेहतर भाषा का सुझाव दे सकते हैं, तो मैं आपके द्वारा प्रस्तावित किसी भी परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं, लेकिन जहां तक मैं इस शब्द को समझने में सक्षम हूं और जहां तक किसी मानक शब्द कोश की सहायता ली जा सकती है, मुझे इस बात को लेकर लेशमात्र भी श्ांका नहीं है कि शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र की दृष्टि से और बुनियादी तौर