बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक
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यह अनावश्यक मामला है, जिसे मेरा विचार है कि तुलनात्मक रवैया अपनाने पर ठीक से समझा जा सकता है। अब मैं उन क्रांतिकारियों का मामला लेता हूं, जो क्रांतिकारी गतिविधियों में लगे होते हैं। यह स्पष्ट है कि इस विधेयक का संशोधन जिन लोगों से निपटने के आशय से प्रस्तुत किया गया है, वे इतना बड़ा खतरा नहीं हैं, जितना क्रांतिकारी हैं। स्पष्टतः उन्हें क्रांतिकारियों से ज्यादा रक्षोपाय और ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता है। अब हम यहां एक क्षण के लिए रुककर पूछें कि क्रांतिकारियों के खिलाफ भारत के कानून में क्या रक्षोपाय थे। मैं इस संबंध में इतिहास में नहीं जाना चाहता। किंतु मेरे सामने उस राजद्रोह समिति (सेडिशन कमेटी) की रिपोर्ट है, जिसे भारत सरकार ने 1913 में नियुक्त किया था। उसके विचारार्थ विषयों में कहा गया है कि ‘भारत में आंदोलन की मौजूदगी पर सूचना देना, आपराधिक षड्यंत्रों से निपटने में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों की जांच करना और ऐसे अपराधियों को दंड देने के उपायों का सुझाव देना।’ मेरे लिए भारत के क्रांतिकारी कार्यों में जाना अनावश्यक है, जिस पर समिति ने विस्तार से विचार किया है। इस उद्देश्य के लिए जो प्रासंगिक है, वह है राजद्रोह समिति द्वारा सुझाया गया रक्षोपाय।
सदन इस समिति के गठन के बारे में जानने के लिए उत्सुक होगा। इसलिए मैं उन भद्र पुरुषों के नाम उद्धृत करता हूं, जिन्हें मिलाकर यह समिति बनी थी : सम्राट पीठ के जज न्यायमूर्ति श्री रोलेट, बंबई के मुख्य न्यायाधीश माननीय बेसिल स्काट, मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दीवान बहादुर सी.वी. कुमार स्वामी शास्त्री, संयुक्त प्रांत के राजस्व बोर्ड के सदस्य माननीय बर्नी लॉवेट और श्री सी.जी. मित्तर। समिति में बहुत बड़ी संख्या में वे लोग थे, जिनकी मानसिकता न्यायिक थी। यह एक तथ्य है कि उस पूरी अवधि के दौरान जिसमें भारत सरकार क्रांतिकारी गतिविधियों से निपटना चाहती थी, उन्होंने इस सिद्धांत को स्वीकार किया था कि क्रांतिकारियों को दंडित करने से पहले एक अभिकरण के द्वारा न्यायिक जांच अवश्य कराई जाए। उनके साथ अदालती न्याय कभी नहीं किया गया था। तर्क यह था कि अभिकरण भारत सरकार की कार्यपालिका में जो व्यक्ति काम करते थे, उनसे बना था। समिति पैरा 182 में कहती है :
हालांकि हम लोग ‘डिफेंस ऑफ इंडिया ऐक्ट’ के तहत स्थापित क्रियाविधि का
सिद्धांत रूप में अनुमोदन करते हैं, तब भी हम मानते हैं कि इन अधिनियमों द्व
ारा गठित अभिकरणों को अब बदल देना चाहिए। हमें यह अनुचित लगता है
कि इन अभिकरणों में ऐसे व्यक्ति हों जो पहले से ही न्यायपालिका के सदस्य
नहीं हैं, बल्कि किसी खास मामले के उद्देश्य से कार्यपालिका द्वारा चुने गए
हैं। हम लोगों ने जो कुछ देखा, उससे ऐसा नहीं लगता कि अभी तक नियुक्त
विशेष अभिकरण अभियुक्त के प्रति पक्षपातपूर्ण रहा है, लेकिन हम समझते हैं