11. बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 180

बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक

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में यह विधेयक एक निश्चित प्रक्रिया निर्धारित करता है, जिसका अनुपालन आयुक्त को करना होता है और वह इस प्रकार है — सबसे पहले, आयुक्त को आरोप का विवरण देना होता है। दूसरे, आयुक्त के आरोप के बारे में संबंधित व्यक्ति को सफाई देने का मौका देना होता है, और तीसरे, उस संबंधित व्यक्ति को अपने गवाह लाने का एक मौका देना पड़ता है। उपखंड (6) का संबंध पुलिस आयुक्त के द्वारा दिए गए आदेश पर फौजदारी अदालत द्वारा सवाल उठाने से है। यह धारा क्या कहती है? यह धारा केवल यह कहती है कि अदालत को यह देखने का अधिकार होगा - इसे मैं सरल रूप से रख रहा हूं — कि क्या इस विधेयक में निर्धारित प्रक्रिया का अनुसरण किया जा रहा है या नहीं। प्रक्रिया के रूप में अनुसरण करने के लिए पुलिस आयुक्त से जो पहली बात कही गई है, वह आरोप का विवरण प्रस्तुत करने से संबंधित है : दूसरे, उसे संबंधित व्यक्ति को आरोप पर सफाई के लिए मौका जरूर देना चाहिए, तीसरे — यह एक ऐसा मुद्दा है, जो मूल रूप में छोड़ दिया गया था, किंतु उच्च न्यायालय के निर्णय का एक हिस्सा था — यह कि आयुक्त के पास सामग्री जरूर होनी चाहिए। अब यह मुद्दा माननीय सदस्य श्री पाटस्कर के संशोधन द्वारा जोड़ दिया गया है। अब, मेरा निवेदन यह है कि हमने खंड के द्वारा यह भी जोड़ा है कि हमने पारित किया है कि इस अधिकार का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जिनमें गवाह सुरक्षा कारणों से पेश होना नहीं चाहते। माननीय सदस्य श्री भोले के संशोधन का उद्देश्य है — एक और आधार को जोड़ना जिससे उच्च न्यायालय आदेश को रद्द कर सके। चूंकि उपखंड में शब्दों में अभिव्यक्ति कर दी गई है, इसलिए किसी व्यक्ति को आरोप की तफसील न दिए जाने और उस पर लगाए गए आरोपों पर सफाई देने का मौका न दिए जाने या उसकी अथवा उसके गवाहों की सुनवाई न किए जाने की स्थिति में उच्च न्यायालय आदेश को रद्द कर सकता है। और अंत में श्री पाटस्कर के संशोधन के अनुसार पुलिस आयुक्त के पास ऐसी कोई भी सामग्री नहीं थी, जिसके आधार पर वह आदेश दे सकता। माननीय सदस्य श्री भोले यह जोड़ना चाहते हैं कि माननीय सदस्य श्री पाटस्कर के संशोधन के पहले भाग में दी गई शर्त, अर्थात् यह कि गवाह, गवाही देने के लिए आगे आना नहीं चाहते हैं, भी एक आधार बन सकती है, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट आदेश को रद्द कर सकता है। इस तरह मजिस्ट्रेट के अधिकारों पर सीमा नहीं लगाई गई है। इसमें एक प्रक्रिया का निर्धारण किया गया है और यह खंड समग्रतः यह बताता है कि उच्च न्यायालय या मजिस्टीरियल कोर्ट यह देखेगा कि इन सब प्रक्रियाओं का अनुसरण पुलिस आयुक्त द्वारा किया जा रहा है। न तो माननीय सदस्य श्री पाटस्कर और न ही यहां कोई व्यक्ति चाहता है कि उच्च न्यायालय या मजिस्टीरियल कोर्ट सामग्री की विश्वसनीयता के प्रश्न पर निर्णय ले। इसके लिए कुल मिलाकर यह देखना आवश्यक है कि आयुक्त के पास सामग्री थी। इसी प्रकार श्री भोले कहना चाहते हैं कि अदालत यह देखे कि पुलिस आयुक्त ने प्रस्ताव में इस तथ्य को ध्यान