बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक 167
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : कौन-से दूसरे उद्देश्य?
माननीय श्री के.एम. मुंशी : ‘और इसके आगे उल्लिखित दूसरे इरादे।’
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : वे अन्य क्या हैं?
माननीय श्री के.एम. मुंशी : इसमें अन्य प्रक्रिया संबंधी उद्देश्य भी हैं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : तब मैं इसको कैसे कहूंगा, ‘ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए।’
माननीय अध्यक्ष : क्या यह सभी प्रस्तावना में जरूरी है? हमें इसे बोझिल नहीं बनाना चाहिए।
माननीय श्री के.एम. मुंशी : इस अधिनियम में आप्रवासियों की भी चर्चा है और इसलिए ‘इसके आगे जरूरी नहीं है।’
श्री एस.वी. पारूलेकर : हम कल के लिए रुक सकते हैं, ताकि हम एक सहमतिपूण् ार् शब्दावली पर पहुंच सकें।
माननीय अध्यक्ष : ऐसा लगता है कि विषय-वस्तु पर सहमति है और अब केवल शब्दावली का प्रश्न है। अब जब कि प्रस्तुत संशोधन की विषय-वस्तु स्वीकार कर ली गई है, तीसरे वाचन के समय कोई आवश्यक शाब्दिक संशोधन किया जा सकता है।
माननीय श्री के.एम. मुंशी : अंत में क्या मैं यह कह सकता हूं? मैं आप्रवासियों को छोड़ना नहीं चाहता।
माननीय अध्यक्ष : यही माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित किया जा रहा है। ‘आगे आने वाले’ इन शब्दों के बदले निम्नांकित को स्थानापन्न कीजिएः
उन लोगों से निपटने के लिए जो बंबई नगर के लिए खतरा हैं और संप्रदायों या पंथों, गिरोहों और गुटों के बीच होने वाले झगड़ों के कारण शांति और व्यवस्था को उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए और इससे आगे परिकल्पित कतिपय अन्य प्रयोजनों के लिए।
माननीय श्री के.एम. मुंशी : मैं इस संशोधन को स्वीकार करता हूं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : क्या मैं जान सकता हूं कि इसमें अन्य उद्देश्य क्या हैं?
माननीय श्री के.एम. मुंशी : आप्रवासियों से निपटने के लिए।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : आप्रवासी विषय है, न कि उद्देश्य।
माननीय बी.जी. खेर : प्रश्न यह है कि वे आप्रवासी जो नगर में कुछ बीमारियां लेकर आते हैं, उनसे निपटना है। प्रस्तावना का उद्देश्य सभी उद्देश्यों को क्रमानुसार
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 19, पृ. 838-40, 10 मार्च 1927