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प्रसूति लाभ विधेयक 177

उद्योग विशेष में इसलिए काम पर लगाता है, क्योंकि उसको पुरुष की अपेक्षा महिला को काम पर लगाने से अधिक लाभ होता है। वह पुरुषों को काम पर लगाकर मिलने वाले लाभ की तुलना में महिलाओं को काम पर लगाकर अधिक मुनाफा अर्जित कर पाता है। इसी कारण यह कहना पूर्णतया उचित है कि इस प्रकार का लाभ प्रदान करने के लिए नियोक्ता की भी कुछ हद तक जिम्मेदारी बनती है, खासतौर पर उस समय जबकि उसे पुरुषों को काम पर लगाने पर मिलने वाले मुनाफे की तुलना में महिलाओं को रखने से अधिक लाभ होता है। अतएव, मेरा यह कहना है कि यद्यपि प्रसूति लाभ के मामले में निश्चित रूप से कुछ जिम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है, तथापि मेरे विचार से यदि इन हालात में विधेयक में नियोक्ता को भी कुछ दायित्व सौंपा गया है, तो उससे विधेयक पूरी तरह गलत नहीं हो जाता। अतएव, इस कारण से मैं विधेयक का समर्थन करता हूं।

यह कहा गया है कि यह विधेयक केवल कारखानों पर लागू किया गया है, अन्य उद्योगों अथवा कृषिगत व्यवसायों पर नहीं। इसका जवाब बहुत सरल है। यह सिद्धांत उन उद्योगों पर लागू किया गया है, जहां के हालात महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। कृषि तथा अन्य व्यवसायों में महिलाओं को उन खतरों का सामना नहीं करना पड़ता अथवा वहां वे हालात नहीं हैं, जो फैक्टरियों में हैं और जो फैक्टरियों में काम करने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इसी वजह से ऐसे विधेयक प्रायः केवल फैक्टरियों पर ही लागू किए जाते हैं। कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम के लिए भी यही बात कही जा सकती है। यह अधिनियम उन दुर्घटनाओं पर लागू होता है, जो श्रमिकों के साथ फैक्टरियों में काम करते समय घटती हैं। इसी कारण यह अधिनियम केवल फैक्टरियों पर लागू किया गया है, अन्य व्यवसायों पर नहीं।

माननीय सामान्य (जनरल) सदस्य ने उद्योगों पर इसका बोझ डालने के बारे में कहा है कि इससे मजदूरी की दरों में कमी आएगी। मैं यह नहीं सोचता कि इससे मजदूरी की दरों में कोई कमी आएगी। यदि ऐसा होता है भी, तो इसका तात्पर्य यह होगा कि उद्योगों पर पड़ने वाला बोझ कुछ हद तक दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाएगा और माननीय सामान्य (जनरल) सदस्य को इसी आधार पर कोई आपत्ति नहीं होगी। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो मेरा यह कहना है कि यह बोझ संभवतया उपभोक्ताओं पर पड़ेगा और यदि यह बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ता है, तो समाज को किसी उत्पादन के लिए अधिक कीमत चुकाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, ताकि उत्पादक को वस्तु के उत्पादन से लाभ पहुंचेगा।

इसके पश्चात् यह कहा गया है कि इस विधेयक को बंबई प्रसिडेंसी में ही लगाना न्यायपूर्ण नहीं है और इसे संपूर्ण भारत पर लागू किया जाना चाहिए तथा बंबई प्रेसिडेंसी को भी भारत के अन्य प्रांतों के समान समझा जाना चाहिए। महोदय!