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कोड़े लगाने की सजा *
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! इस विधेयक के प्रभारी अपने माननीय मित्र श्री बेल तथा माननीय सदस्य विधि परामर्शी को सुनने के पश्चात् मैं नहीं समझता कि इस उपाय को अपनाने की आवश्यकता के पक्ष में कोई और तर्क प्रस्तुत करने की आवश्यकता रह गई है, और न ही मेरे विचार में इस बात की आवश्यकता है कि इस विषय में कोई तर्क किया जाए कि क्या कोड़े लगाना एक उचित सजा है? बंबई नगर में हमने बहुत गंभीर दंगों का सामना किया है और प्रायः मुफस्सल कस्बों में भी हमने ऐसा देखा है। मुझे विश्वास है कि कोई भी माननीय सदस्य इससे इंकार नहीं कर सकता कि यह सब भारतीय समाज तथा भारतीय सभ्यता पर एक कलंक है। भारतीय संविधा पुस्तिका में कोड़े लगाने की सजा का प्रावधान होना स्वयं ही उन लोगों के विरुद्ध एक तर्क है, जो यह कहते हैं कि हम एक नया काम करने जा रहे हैं। महोदय! मेरी विनम्र राय में अब केवल एक मुद्दा बचा है, जिस पर बहस की आवश्यकता है। वह मुद्दा है कि क्या इस विधेयक के प्रावधान, जैसा कि उन्हें तैयार किया गया है, अवसर को देखते हुए जरूरत से ज्यादा कठोर हैं। मेरे विचार में केवल यही एक ऐसा मुद्दा बचा है, जिस पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
महोदय! विधेयक का अध्ययन करने के पश्चात् मैं विधेयक के खंड 2 जो कि मुख्य खंड है, उसमें वर्णित उपबंधों से सहमति व्यक्त करने में कुछ कठिनाई महसूस करता हूं। इस खंड के वर्तमान रूप में कोड़ा अधिनियम की धारा 4 के उपबंध उन सभी दंगों संबंधी अपराधों पर लागू नहीं होंगे, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 146 तथा 148 के अंतर्गत आते हैं। महोदय! मैं सोचता हूं कि यह कदम जैसा कि कहा जाता है, सांप्रदायिक दंगों से निपटने के विशेष उद्देश्य से तैयार किया गया था। महोदय! दंगे भिन्न-भिन्न प्रकार के हो सकते हैं। उनके पीछे उद्देश्य, इरादे तथा अवसर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। बंबई नगर में औद्योगिक हड़ताल के कारण दंगे हो सकते हैं। किसी संपत्ति पर अधिकार जताने के लिए एकत्र हुए गरीब लोगों के बीच मामूली झगड़े के फलस्वरूप भी दंगे हो सकते हैं। हो सकता है कि अधिकार
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 37, पृ. 652-53, 18 फरवरी 1933