184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
और जिनके पास अपने दूसरे साधन हैं, शासन में आएंगे। इसका दूसरा परिणाम होगा कि जो लोग दूसरी किसी तरह पैसा नहीं कमा सकते, वे लोग मंत्री बनेंगे। इसके अलावा कोई और परिणाम नहीं हो सकता (ठहाका)। मेरे मित्र हंस सकते हैं, लेकिन मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस विधेयक के यही परिणाम निकलेंगे। यदि मेरी यह आशंका सच निकली तो इससे बड़ी दुर्घटना कोई नहीं होगी। हम यह चाहते हैं कि भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत दी गई राजनैतिक शक्तियां कुछ ऐसे थोड़े लोगों द्वारा नहीं हथियाई जानी चाहिए जो धनी हैं और जिन्हें वेतन की चिंता नहीं है। आम जनता के हित में हम यह भी नहीं चाहते हैं कि शक्ति अक्षम व्यक्तियों के हाथों में चली जाए।
अब मैं दूसरे पहलू अर्थात् सत्यनिष्ठा और स्वच्छ प्रशासन पर आता हूं। मेरे एक कांग्रेसी मित्र ने एक बात कही थी। मैं उसे इस सदन में दोहराना चाहता हूं। उन्होंने कहा था कि यदि गवर्नर उन्हें मंत्रियों की सप्लाई करने का ठेका दें, तो वह खुशी से उसे स्वीकार करेंगे और ठेका देने के लिए बंबई प्रेसिडेंसी को भी कुछ भेंट देंगे। महोदय! मेरे विचार में यह टिप्पणी अत्यंत संभावनापूर्ण है। यूरोप में ऐसे होटल हैं, जो प्रतीक्षा करने की अनुमति देने के कारण प्रबंधकों को पैसा देते हैं। इससे पता चलता है कि जो लोग अपने वेतन के अतिरिक्त कुछ और कमाना चाहते हैं, उन्हें ऐसा करने के अवसर प्राप्त होने की पूरी संभावनाएं हैं। मैं वर्तमान मंत्री परिषद के विषय में कोई बात नहीं कह रहा हूं, क्योंकि हम इस विधेयक के सिद्धांतों पर बहस कर रहे हैं, संबंधित व्यक्तियों के विषय में नहीं। मैं यह स्वीकार करता हूं, सहर्ष स्वीकार करता हूं कि आप उच्च वेतन पर किसी भी बेईमान व्यक्ति की बेईमानी नहीं खरीद सकते। आप उसे कुछ भी वेतन दीजिए, यदि वह बेईमान है तो वह बेईमान ही रहेगा। हालांकि यह विचारणीय विषय नहीं है। विचारणीय विषय है कि क्या आप अपना वेतन इस प्रकार निर्धारित नहीं कर सकते कि मंत्री को लोभी होने से रोका जा सके।
महोदय! हम इस प्रेसिडेंसी में 4,000 रुपए तथा 3,000 रुपए तक वेतन दे रहे थे और फिर भी यहां प्रशासन से संबंधित घोटाले हुए। यदि 3,000 रुपए और 4,000 रुपए के वेतन के पश्चात् भी घोटालों से निजात पाना संभव नहीं है, तो मुझे डर है कि 500 रुपए का वेतन पिछले घोटालों का कारण बनेगा। इस प्रकार केवल यह प्रश्न हमारे सामने विचार के लिए प्रस्तुत नहीं है कि क्या वेतन पर्याप्त है? परंतु मेरा दृष्टिकोण यह है कि तर्क-वितर्क यहीं समाप्त नहीं होता। वेतन की समस्या पर दो दृष्टिकोणों से विचार करने की आवश्यकता है। व्यक्ति की दृष्टि से वेतन पर्याप्त होना चाहिए। राज्य की दृष्टि से सुरक्षा तथा प्रशासन की स्वच्छता विचारणीय विषय है। कोई व्यक्ति कह सकता है कि वेतन विशेष उसके लिए पर्याप्त है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप यह नहीं सोचें कि वह सार्वजनिक दृष्टिकोण से