186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यहां ऐसा सोचना लगभग व्यर्थ है कि ऐसा कहने से हम किसी फालतू निष्कर्ष
पर नहीं पहुंच जाएंगे, यद्यपि कभी-कभी ऐसे आरोप लगाए जाते हैं। वह यह है
कि न्यून वेतन स्वीकार करना पद मिलने की योग्यता मानी जाए। मितव्ययिता
भी युक्तिसंगत होनी चाहिए। किसी विश्वसनीय पद के लिए सर्वोत्तम, योग्य और
ईमानदार व्यक्ति के चयन में अधिक वेतन देने के प्रश्न को जरूरत से अधिक
महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। यह बात कई बार दोहराई जा चुकी है और
यह सत्य और युक्तिसंगत भी लगती है कि एक स्वतंत्र देश में एक सामान्य
आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति के लिए सरकारी पद पाना उसकी पहुंच के बाहर
नहीं होना चाहिए। यदि वेतन बहुत कम निर्धारित किए गए, तो सरकारी पदों
पर धनी लोगों का अधिकार हो जाएगा और सरकार के चयन के अधिकार
पर भारी प्रतिबंध लग जाएंगे और जनता ऐसे लोगों की सेवाओं से वंचित हो
जाएगी, जिनके आर्थिक साधन सीमित हैं, पर जो शिक्षित हैं और इस प्रकार के
कार्य करना चाहते हैं और जिनमें सरकारी पदों के अनुरूप अधिक योग्यता और
क्षमता है। और इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि उच्च सरकारी
पदों पर ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो पूरे समय तक निष्ठापूर्वक
काम कर सकें और उस पर पूरा ध्यान दे सकें। इससे उनके निजी कार्यों की
उपेक्षा होगी। और एक ओर यदि इस बात पर ध्यान देना चाहते हैं कि लोग
सरकारी खर्चे पर अपने लिए धन न बटोर लें, तो दूसरी ओर यह न तो देश के
और न उसकी प्रतिष्ठा के हित में होगा कि इन लोगों को देश सेवा की खातिर
तबाह कर दिया जाए।
महोदय! मैं कहना चाहता हूं कि देश की सेवा और प्रशासन की स्वच्छता के प्रति संवेदनशील कोई भी मंत्रिमंडल इन सिद्धांतों को ध्यान में रखेगा और मुझे नहीं लगता कि इस मंत्रालय ने 500 रुपए का वेतन निर्धारित करते समय इन सिद्धांतों की तरफ कोई ध्यान दिया है।
महोदय! अब मैं उन सिद्धांतों का उल्लेख करूंगा, जिनका सुझाव इस विधेयक में वेतन के निर्धारण के लिए दिया गया है। मैं प्रायः सुनता आया हूं कि वेतन जनता की आय के अनुरूप होने चाहिए। मैं पूछना चाहता हूं कि यदि ऐसा है तो क्या यह कहा जा सकता है कि क्या 500 रुपए का वेतन जनता की आय के अनुरूप है? लोगों की आय कितनी है? मेरे पास ‘हरिजन’ में दिए गए आंकड़े हैं, जिन्हें मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। मैं समझता हूं कि ‘हरिजन’ एक प्रामाणिक पत्र है।
माननीय श्री बी.जी. खेर : मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप इसे पढ़ते हैं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं इसे हमेशा पढ़ता हूं। इसमें दिए गए आंकड़ों के
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, ख्ांड 1, पृ. 279-80, 23 अगस्त 1937