16. मंत्रियों के वेतन विधेयक - Page 205

188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

महोदय! एक और बात यह है कि मंत्री परिषद ने त्यागपूर्ण जीवन बिताने का फैसला किया है। इससे मुझे मध्ययुगीन भिक्षुओं के आचरण और जीवन-यापन के तौर-तरीकों की याद आती है। मध्ययुगीन मठवासियों को अपना जीवन प्रारंभ करते समय तीन प्रतिज्ञाएं लेनी पड़ती थीं — अविवाहित जीवन, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह का जीवन व्यतीत करना।

मुझे नहीं मालूम कि मेरे माननीय मित्रों ने अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा ली है या नहीं (ठहाका)। मेरे विचार में अब ऐसा करने में काफी विलंब हो चुका है। मुझे मालूम नहीं है कि उन्होंने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली है या नहीं। लेकिन यदि उन्होंने ऐसा किया है और यदि वे अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते हैं, तो निश्चय ही यह इस सदन के लिए चिंता का मामला नहीं है। लेकिन जैसा कि मुझे इस विधेयक से प्रतीत होता है उन्होंने निश्चय ही अपरिग्रह की प्रतिज्ञा ली है। क्या वे इस प्रतिज्ञा को निभा सकेंगे? मध्ययुगीन भिक्षु ब्रह्मचर्य की अपनी प्रतिज्ञा पर बहुत कम टिक पाते थे, लेकिन उन्होंने सदैव अपरिग्रह की अपनी प्रतिज्ञा निभाई है। ऐसा क्यों था? ऐसा इसलिए संभव था, क्योंकि भिक्षु का कोई परिवार नहीं होता था। वे अकेले थे, नितांत अकेले। किसी भी व्यक्ति की जिम्मेदारी उन पर नहीं थी। लेकिन इस संबंध में मंत्रियों की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। उन पर उनके परिवार और बच्चों की अनेक जिम्मेदारियां हैं। मैं नहीं समझता कि वे अपरिग्रह की अपनी प्रतिज्ञा निभा पाएंगे। मैं उनकी सफलता की कामना करता हूं, परंतु मुझे संदेह है कि क्या वे ऐसा कर पाएंगे।

श्री ए.वी. चित्रे : वे अपना वेतन प्राप्त करें?

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! अब मैं एक दूसरे विषय पर बोलना चाहता हूं। क्या इस विधेयक की कोई आवश्यकता भी है? मैं व्यक्तिगत रूप से समझता हूं कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। कोई भी व्यक्ति माननीय मंत्रियों को उनकी इच्छा से ज्यादा वेतन लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। निश्चित रूप से इस विधेयक को लाए बगैर, और गवर्नर द्वारा निश्चित वेतनों को इतना ही रहने देने पर भी वे 500 रुपए लेकर शेष राशि अपनी इच्छानुसार सरकार अथवा पार्टी के कोष में जमा करा सकते हैं। क्या कारण है कि वे ऐसा नहीं करते? क्या कारण है कि वे यह विधेयक प्रस्तुत कर रहे हैं? यही वह बात है, जहां संदेह उत्पन्न होता है। मैं यह कहने का साहस कर रहा हूं कि यह विधेयक किसी पवित्र उद्देश्य के लिए प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसके पीछे सोची-समझी चाल छिपी है। वह यह है कि वे सदैव सत्ता में बने रहेंगे और कोई दूसरा व्यक्ति उनका स्थान न ले सके।

माननीय श्री के.एम. मुंशी : हां, आप ऐसा कह सकते हैं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : इस समय मुझे गोलमेज सम्मेलन की याद आती है, जिसमें कंजरवेटिव पार्टी भारत सरकार द्वारा विधेयक के उपबंधों में कुछ धाराएं जोड़ने का प्रयास कर रही थी, जिनका उद्देश्य केवल लेबर पार्टी के काम करने पर सीमा

* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 2, पृ. 425-26, 20 जनवरी 1938