16. मंत्रियों के वेतन विधेयक - Page 206

मंत्रियों के वेतन विधेयक 189

बांधना था। हम में से कई लोग उनसे पूछते थे कि वे भारत सरकार विधेयक में ये धाराएं क्यों जोड़ना चाहते हैं, जिनका स्पष्ट रूप से कोई औचित्य नहीं है। उनके पास हमारे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति जानता था कि वास्तव में वे लेबर सरकार को, यदि वह कभी सत्ता में आती है, तो उसे कंजरवेटिव पार्टी द्वारा की गई कार्रवाई को उलटने से रोकना चाहते थे। यदि मेरे विद्वान मित्र वही नीति अपनाना चाहते हैं, तो वे ऐसा कर सकते हैं। हम उन्हें नहीं रोक सकते। मैं केवल यह कहना चाहता हूं, यह सत्ता का दुरुपयोग है।

इस अवसर पर, मैं अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहता हूं, क्योंकि 500 रुपए के वेतन को बहुत कम बताने से मुझे गलत समझा जा सकता है। मेरा यह कहना नहीं है कि अंतरिम मंत्री परिषद द्वारा सुझाया गया 4,000 रुपए अथवा 3,000 रुपए का वेतन मानक वेतन था। किसी को भी यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि मैं यह नहीं कह रहा कि 4,000 रुपए अथवा 3,000 रुपए समुचित वेतन है। मैं स्वयं को किसी आंकड़े तक सीमित नहीं करना चाहता। मैं तो केवल इतना कहना चाहता हूं कि एक मंत्री के लिए 500 रुपए समुचित वेतन नहीं है। मेरे इस बयान से निस्संदेह मेरी यह कहकर आलोचना हो सकती है कि मैं फिजूलखर्ची का सुझाव दे रहा हूं। लेकिन मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वेतन निश्चित रूप से इस विधेयक में निश्चित किए गए वेतन से अधिक होना चाहिए। यदि वेतन बढ़ा दिया जाता है, तो निश्चय ही यह मुझे नहीं मिलेगा। और जहां तक मैं देखता हूं कि भविष्य में भी मैं इसे कभी प्राप्त नहीं कर पाऊंगा।

माननीय श्री बी.जी. खेर : हतोत्साहित न होइए।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं अपने विद्वान मित्र को जवाब देने की आवश्यकता नहीं समझता। लेकिन उनकी नीति यह है, कि उन्होंने जानबूझकर अनुसूचित वर्ग के सदस्यों को अपनी मंत्री परिषद से बाहर रखा है।

माननीय के.एम. मुंशी : संभवतः वे 500 रुपए न लेना चाहें।

माननीय अध्यक्ष : शांत रहें।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मुझे यह प्रस्ताव रखते हुए कोई परेशानी नहीं, क्योंकि मैं यह वेतन प्राप्त नहीं करूंगा। मेरा उद्देश्य जनहित है। डॉ. जॉनसन ने कहा था कि देशभक्ति दुष्टों का अंतिम सहारा है। वह भली-भांति कह सकते थे कि राजनीति भी दुष्टों का अंतिम सहारा है। चूंकि मैं यह नहीं चाहता कि भारत में राजनीति दुष्टों का अंतिम सहारा बने, इसलिए मैं बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।

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डॉ. भीमराव अम्बेडकर * (बंबई नगर) : महोदय! मैं अपने माननीय मित्र प्रधानमंत्री से केवल इतना कहना चाहूंगा कि क्या अलग-अलग मदों के लिए प्रावधान करने के स्थान पर एकमुश्त वेतन का प्रावधान करके यह समस्या हल नहीं हो सकती।