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अपराधी परिवीक्षा विधेयक *
डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर) : अध्यक्ष महोदय! ऐसा लगता है कि इस विधेयक के प्रति ज्यादा उत्साह नहीं है, क्योंकि सदन के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले अन्य विधेयकों के समक्ष दिखाई देने वाली होड़ यहां नहीं दिखाई पड़ रही है, यद्यपि मेरी इच्छा एक ही धारा के बारे में बोलने की है, लेकिन मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि मैं अपने को इस विधेयक के प्रति बिल्कुल भी उत्साहित महसूस नहीं कर पा रहा हूं और मैं यह निवेदन करता हूं कि यह बिल्कुल स्वाभाविक है, क्योंकि विधेयक ऐसी किसी समस्या का उल्लेख नहीं करता है, जिसे गंभीर या तात्कालिक महत्त्व का कहा जा सके। इसमें बहुत ही छोटी समस्या की चर्चा की गई है। मुझे बताया गया है कि विधेयक अंग्रेजी संविधि का बहुत मिलता-जुलता अनुकरण है। मुझे पता नहीं है कि अंग्रेज लोगों के जिस कानून को इस विधेयक का आदर्श बनाया गया है, उन्हें इस कानून से कोई विशेष लाभ पहुंचा है। लेकिन मुझे विश्वास है कि माननीय गृह मंत्री ने स्थिति की सावधानीपूर्वक जांच की है और स्पष्ट रूप से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस अधिनियम से, जिस देश में यह अभी लागू है, मिलने वाले लाभ निश्चित रूप से इतने पर्याप्त हैं कि हमें अपने प्रांत में उसी विधान के अनुरूप कानून बनाना चाहिए।
महोदय! इस विधेयक में निहित विस्तृत प्रावधानों के संदर्भ में मुझे कुछ नहीं कहना है और मैं शुरू में ही कहना चाहता हूं कि विधेयक को इसी रूप में पढ़ने से मुझे लगता है कि इस विधेयक में सम्मिलित सिद्धांतों का मैं समर्थन कर सकता हूं। केवल एक खंड है, जिसके बारे में मुझे कठिनाई महसूस होती है और जिस पर मैं माननीय गृह मंत्री का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। वह खंड 6 है। अगर नरम भाषा का इस्तेमाल किया जाए तो मुझे लगता है कि खंड 6 का अर्थ ऐसे सिद्धांत को सम्मिलित करना है, जो लागू करते समय कुछ हद तक दमनकारी बन सकता
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 336-37, 5 मार्च 1938