4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इस दृष्टिकोण से राजस्व को देखें तो मुझे लगता है कि भू-राजस्व जो बजट की सबसे बड़ी मद है, उसमें 50 लाख रुपए तक की घट-बढ़त हो सकती है।
यदि आप उत्पाद शुल्क को लें, जो राजस्व का दूसरा बड़ा स्रोत है, तो आप देखेंगे कि सुधारों की शुरुआत के बाद से अब तक उसमें 73 लाख रुपए की घट-बढ़त हुई है। इसलिए राजस्व-प्रणाली को इन दो मदों द्वारा एक ही परिवर्तित दिशा का अनुकरण करने से उत्पन्न परिणामों के संबंध में विचार करने के लिए मैं अपने मित्र माननीय वित्त सदस्य का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। यदि ऐसी स्थिति रहती है, तो मेरे विचार से वह एक करोड़ रुपए से अधिक का गच्चा खा जाएंगे। मैं नहीं समझता कि इस प्रकार की राजस्व-प्रणाली पर माननीय वित्त सदस्य को भरोसा करना चाहिए। लेकिन यह सब देखना मेरा नहीं, उनका काम है, क्योंकि इस प्रेसिडेंसी की वित्त-व्यवस्था का कार्यभार उन पर है।
अध्यक्ष महोदय! राजस्व की इन्हीं मदों पर करदाताओं के दृष्टिकोण से विचार करते हुए मैं मानता हूं कि इस प्रांत की कर-प्रणाली अनुचित है और इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। सर्वप्रथम, भू-राजस्व को ही लें। चाहे इसे कर कहिए या किराया, मैं निस्संदेह कह सकता हूं कि भू-राजस्व व्यापारियों के लाभांश पर लगने वाले कर जैसा ही है। यदि ये दोनों कर एक जैसे ही हैं, तो मैं माननीय वित्त सदस्य से जानना चाहता हूं कि इन दोनों पर कर लगाने की प्रणाली भेदभावपूर्ण क्यों है? प्रत्येक किसान से, उसकी चाहे जो भी आय हो, भू-राजस्व वसूल किया जाता है। लेकिन आयकर के अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति को साल-भर में कोई आय नहीं हुई है, तो उसे कोई कर देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह कर प्रणाली भू-राजस्व के संबंध में लागू नहीं होती। फसल चाहे कम हो या ज्यादा, गरीब किसान को भू-राजस्व देना ही पड़ता है। आयकर की वसूली करदाता की क्षमता के अनुसार मान्यता प्राप्त सिद्धांतों के आधार पर होती है। लेकिन भू-राजस्व प्रणाली के अंतर्गत व्यक्ति चाहे एक एकड़ का मालिक हो, या जागीरदार हो, या इनामदार हो, उस पर एक ही दर से कर लगाया जाता है। यह आनुपातिक कर है, किंतु यह विकासोन्मुख नहीं है, जैसा कि इसे होना चाहिए। फिर आयकर के अंतर्गत आय की निश्चित सीमा से नीचे की आय वालों को कर नहीं देना पड़ता। लेकिन भू-राजस्व के अंतर्गत व्यक्ति चाहे गरीब हो या अमीर, उसे लगान अवश्य देना पड़ता है।
अब आप उत्पाद शुल्क को ही लें, यह एक ऐसा स्रोत है, जिससे बहुत ज्यादा राजस्व प्राप्त होता है। इसके बारे में कोई मतभेद नहीं हो सकता कि यह एक सार्वजनिक वैधानिक एकाधिकार है। यह इस आशय से नहीं लगाया गया था कि सरकार राजस्व में वृद्धि करने के लिए समर्थ हो, बल्कि यह एकाधिकार उसकी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए दिया गया था, ताकि वह जनता की नशाखोरी की आदत के बढ़ने से जो नैतिक पतन हो रहा है, उस पर रोक लगा सके। यदि राजस्व की उगाही ही एकमात्र लक्ष्य