बजट पर चर्चा
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है, तो सरकारी एकाधिकार की कोई जरूरत नहीं है। सरकार द्वारा इस एकाधिकार को किस प्रकार व्यवस्थित किया गया है? प्रत्येक प्रांत में लोग मद्यपान पर कितना पैसा खर्च करते हैं, यदि आप इसके आंकड़े देखें, तो आप पाएंगे कि बंबई प्रेसिडेंसी नशाखोरी के संबंध में प्रथम स्थान पर है। मैं देखता हूं कि मद्रास में हर व्यक्ति मद्यपान पर 1-3-7 (1.22) रुपए खर्च करता है। बंगाल में 0-7-1 (0.45) रुपए, संयुक्त प्रांत में 0-4-7 (0.28) रुपए, पंजाब में 1-7-8 (1.48) रुपए, बर्मा में 0-13-3 (1.25) रुपए, बिहार और उड़ीसा में 0-8-7 (0.58) रुपए, मध्य प्रांत और बरार में 0-15-0 (0.94) रुपए, आसाम में 0-13-3 (.83) रुपए, लेकिन बंबई में यह भयानक आंकड़े हैं — प्रति व्यक्ति 2-2-9 (2.18) रुपए। मैं अपने माननीय मित्र वित्त सदस्य से पूछना चाहता हूं कि क्या यह समर्थन करने योग्य प्रणाली है? अध्यक्ष महोदय सरकार ने मद्यनिषेध की नीति को लागू करने का निर्णय लिया है और इस नीति को सफल बनाने के लिए कुछ उपाय भी किए हैं। लेकिन नशाखोरी कम नहीं हुई है। सबसे पहले इन उपायों में राशनिंग-प्रणाली को लागू किया गया। अध्यक्ष महोदय! अब सरकार ने राशन के माध्यम से देशी शराब की बिक्री की, जो सीमा तय की है, वह 18,83,804 गैलन है। लेकिन खपत की रोकथाम पर लगाई गई सीमा मात्र एक धोखा और बहाना है, क्योंकि
खपत की वास्तविक मात्रा केवल 14,05,437 गैलन है, अर्थात् बिक्री की वास्तविक मात्रा खपत की मात्रा से 4,78,367 गैलन अधिक है। मैं समझता हूं कि मद्यनिषेध की नीति को सफल बनाने के लिए जो दूसरा उपाय लागू किया गया, वह है सलाहकार समिति की नियुक्ति। लेकिन मुझे पता चला है कि इस सलाहकार समिति के 40 प्रतिशत सदस्य मद्यनिषेध के विरोधी हैं। अध्यक्ष महोदय! मैं नहीं जानता कि सरकारी पक्ष के सदस्य इस परिषद को उतना मान दे रहे हैं, जितना उनसे अपेक्षित है। अध्यक्ष महोदय! इस प्रेसिडेंसी की आर्थिक-प्रणाली की विवेचना करते समय मैं माननीय वित्त सदस्य को यह सुझाव देना उचित समझता हूं कि लोगों की समृद्धि ही राज्य की सबसे बड़ी धरोहर होती है। उन्हें उनको दयनीय या भिखारी नहीं बना देना चाहिए। जो राज्य अपनी जनता को भिखारी बना देता है, अंततः वह खुद भी भिखारी हो जाता है। अध्यक्ष महोदय! अब मैं कुछ और बातों का उल्लेख करना चाहता हूं। लेकिन मैं जानता हूं कि मुझे बोलने के लिए जो समय दिया गया है, वह अब समाप्त होने वाला है। अतः मुझे कुछ और समय देने की कृपा करें।
माननीय अध्यक्ष : नहीं, नहीं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : जब मैं राजस्व के अन्य स्रोतों के बारे में विचार करता हूं, तो मैं इस नतीजे पर पहुंचता हूं कि माननीय वित्त सदस्य प्रेसिडेंसी के स्रोतों का प्रबंध इस किफायत से नहीं कर रहे हैं, जिससे कि प्रेसिडेंसी को पूरा लाभ मिले। उदाहरण के तौर पर राजस्व के स्रोत के रूप में वनों को लें। वर्ष 1921-22 में वनों से 74.9 लाख रुपए राजस्व के रूप में प्राप्त हुए थे, लेकिन 1927-28 में वनों से