19. न्यायपालिका की स्वतंत्रता - Page 214

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

समक्ष प्रस्तुत निश्चित अधिनियम तक ही अपने को सीमित रखें।

197

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! क्या मैं यह निवेदन कर सकता हूं कि सादृश्यता का उल्लेख करने और तर्क देने तथा उसके गुणावगुणों की चर्चा करने में भिन्नता होती है। अगर मैं बारडोली भूमि की वापसी के प्रस्ताव के गुण-दोषों की बात करूं, तो निश्चित रूप से मैं आपके द्वारा बताई गई आपत्ति का पात्र बनूंगा। लेकिन आपकी व्यवस्था के अंतर्गत मैं यह अवश्य कहूंगा कि यह अधिनियम सरकार की गतिविधियों की शृंखला की पराकाष्ठा है और सरकार की एक पिछली गतिविधि की चर्चा करते समय उसके गुणावगुणों में न जाकर मैं अपना वक्तव्य साढ़े पांच बजे तक समाप्त करने को सहमत हूं।

माननीय अध्यक्ष : मुद्दा यह नहीं है कि माननीय सदस्य एक निश्चित अवधि में अपनी बात समाप्त करने को सहमत हैं। मेरे विचार में यह एक निश्चित मामला है तथा माननीय सदस्य को किसी निश्चित मामले पर चर्चा करने के लिए सदन में अनुमति दी गई है, लेकिन मामलों का उल्लेख करने मात्र से नए मुद्दे उठ सकते हैं। इसलिए मैं यह महसूस करता हूं कि सामान्य हालात में भी मेरा अन्य विषयों के उल्लेख की अनुमति देना सही नहीं होगा। किसी भी सदस्य की स्वतंत्रता को मैं कम नहीं करना चाहता। मैं यह अवश्य चाहता हूं कि इस मामले में जितने मुद्दे हो सकते हैं, उन पर बल दिया जाए। लेकिन मैं अन्य मामलों का उल्लेख करने की अनुमति नहीं दूंगा, चाहे कार्य करने या न करने का सवाल ही क्यों न हो। ऐसा नहीं है कि मैं सदन की बैठक जल्दी खत्म करने को उत्सुक हूं और इसलिए उन संदर्भों की अनुमति नहीं देना चाहता। माननीय सदस्य सदन के समक्ष इस मुद्दे पर अपनी पूरी बात कहने का अधिकार रखते हैं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं इस संदर्भ में सदन के समक्ष विषय तक ही अपनी टिप्पणी सीमित रखूंगा।

महोदय! अब मैं सदन के समक्ष इस मामले के संदर्भ में यह कहना चाहता हूं कि सबसे पहले हमारे पास समाचार-पत्रों से मिली जानकारी के सिवाए मामले के तथ्य हमें नहीं बताए गए हैं। हमारे पास कोई निश्चित आंकड़े नहीं हैं और मुझे बताया गया है, यद्यपि माननीय गृह मंत्री से अनुरोध भी किया गया था कि वह वास्तविक तथ्यों की जानकारी सदन को दें, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए मैं सदन के अन्य सदस्यों की तरह कठिनाई महसूस कर रहा हूं। हो सकता है कि आखिर में जब तथ्यों को उजागर किया जाएगा, तब यह पाया जाए कि यह बहस या तो अनावश्यक थी, या असामयिक थी। लेकिन अगर बहस बेकार व अनावश्यक बन जाती है, तो इसका दोष आवश्यक रूप से माननीय गृह मंत्री के ऊपर है, क्योंकि उन्होंने ही सदन को विश्वास में नहीं लिया और वास्तव में क्या हुआ यह नहीं बताया। अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो शायद प्रस्ताव के माननीय प्रस्तावक ने