न्यायपालिका की स्वतंत्रता 199
जा सकता था, वह थी कि वे अधिक ऊंचे अधिकरण से अपील करना चाहते थे, इस परिकल्पना के विरुद्ध यह सबको पता है और मुझसे कहीं बेहतर गृह मंत्री जानते हैं — मैं जितना हूं वह मुझसे कहीं ज्यादा बेहतर वकील हैं — कि प्रिवी काउंसिल ने अनेक मामलों में यह निर्णय दिया है कि वे भारत में किसी भी फौजदारी न्यायालय से कोई भी अपील नहीं सुनेंगे, जब तक कि यह न बताया गया हो कि मुकदमे के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता के साधारण प्रावधान का नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया है। उन्होंने अपने विवेकपूर्ण तरीके से फौजदारी अपीलों की सुनवाई के अवसर और अधिकार को पूर्णतया सीमित कर दिया है और इस मामले में किसी ऐसे सुझाव का आभास भी नहीं मिलता कि मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय में जहां मुकदमा व अपील क्रमशः संचालित की गई थी, वहां किसी भी तरह से दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी हुई हो। मुझे कोई और परिस्थिति नजर नहीं आती, जो प्रथम दृष्टि में यह विश्वास दिला सके कि ऐसा कोई तर्कपूर्ण कारण था, जिसने गृह मंत्री को इन लोगों को सुनाई गई सजा को निलंबित करने के लिए प्रेरित किया।
महोदय! फिर मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि कम से कम मुझे किसी ऐसी मिसाल की जानकारी नहीं है, जहां किसी कारण से किसी भी पूर्व गृह मंत्री ने साधारण अपराधी की सजा निलंबित की हो। और निश्चित रूप से किसी भी सरकार ने बीमारी या निजी कठिनाई को सजा के निलंबन के पर्याप्त कारण के रूप में नहीं माना है, जो न्यायिक रूप से प्रांत के उच्चतम न्यायालय ने दी हो। इसलिए मैं निवेदन करता हूं कि जब तक कि कोई उचित तर्क सामने न आए, यह सबसे लज्जाजनक कार्य है कि गृह मंत्री ने उच्च न्यायालय की अवहेलना करके सजा निलंबित कर दी हो। वह अच्छी तरह से जानते हैं कि कम से कम समाचार-पत्रों से मिले तथ्यों के आधार पर हम जानते हैं कि आवेदन उस वकील द्वारा दिया गया था, जो उन अपराधियों की ओर से उच्च न्यायालय में उपस्थित हुआ था। जब वे जेल में थे, तब वकील ने इन लोगों के प्रति विशेष ध्यान रखने का आवेदन दिया था कि उनसे द्वितीय श्रेणी के अपराधियों की तरह व्यवहार किया जाए। मुझे यह भी बताया गया है कि जो वकील अपीलकर्ताओं की ओर से उपस्थित हुआ था, उसने यह आवेदन दिया था कि कुछ समय के लिए सजा निलंबित कर दी जाए। वे दोनों आवेदन खारिज कर दिए गए थे। उन्हीं आवेदनों में से कम से कम एक पर गृह मंत्री ने अनुमति दी। महोदय! कानून-व्यवस्था की अवमानना करने का जो अपराध गृह मंत्री ने किया है, इससे बड़ा कोई और निश्चित तरीका नहीं हो सकता। यह
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 420-24, 7 मार्च 1938, रेलवे यूनियन के श्री जमनादास मेहता ने सदन को स्थगित करने के लिए स्थगन प्रस्ताव रखा था, ताकि जनता का ध्यान बंबई उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता में सरकारी हस्तक्षेप की ओर आकृष्ट किया जा सके। सरकार ने जाधवजी और धीरजलाल नामक कैदियों की सजा को उस समय मुल्तवी कर दिया था, जब उच्च न्यायालय ने उनके आवेदन खारिज कर दिए थे।