20. पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन - Page 219

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पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन *

डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर, भायखला और परेल) : महोदय! मेरे माननीय मित्र श्री अली मोम्मद खान देहलवी ने जो कहा है, उससे मैं पूर्णतया सहमत हूं और मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि इस मुद्दे पर आपकी राय ठीक है। मैं आपका ध्यान नियम 22, उप-नियम (2) की ओर दिलाना चाहता हूं, जिसके अनुसार :

अध्यक्ष किसी भी प्रस्ताव को या प्रस्ताव के हिस्से को इस आधार पर अस्वीकृत कर सकता है कि वह विषय मुख्य रूप से प्रांतीय सरकार द्वारा विचारणीय नहीं है और अगर वह ऐसा करता है तो प्रस्ताव या प्रस्ताव का हिस्सा कार्यसूची में दर्ज नहीं किया जाएगा।

इसलिए मैं निवेदन करता हूं कि यह प्रस्ताव ऐसी समस्या से संबंधित है, जो मुख्य रूप से प्रांतीय सरकार का मामला नहीं है और जहां तक उसमें सिफारिश की गई है कि कुछ क्षेत्र जो अब मद्रास प्रेसिडेंसी के भाग हैं, उन्हें पृथक कर दिया जाए, मैं निवेदन करता हूं कि यह प्रांतीय सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है। लेकिन, महोदय! धारा 290 की बात करते हुए, जिसका उल्लेख मेरे माननीय मित्र श्री जोग ने किया है, इस तथ्य की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि वर्तमान भारत सरकार अधिनियम की धारा 290, भारत सरकार अधिनियम 1919 की धारा 52क के सदृश्य है। भारत सरकार अधिनियम 1919 की धारा 52क की तुलना धारा 290 के साथ करते हुए, यह पता चलता है कि उसमें एक मूलभूत व सुविचारित परिवर्तन किया गया है। पुराने अधिनियम के अंतर्गत धारा 52 में कहा गया था कि अगर कोई नया प्रांत बनाना है, तो स्थानीय विधान मंडल स्वतंत्र था कि इस संबंध में वह प्रस्ताव पारित करे और इसकी सूचना गवर्नर जनरल को दे, क्योंकि जैसा कि आपको याद होगा, 1919 में पुराने अधिनियम के अंतर्गत नए प्रांत बनाने का अधिकार गवर्नर जनरल में निहित था और इससे पहले कि गवर्नर जनरल धारा 52क के तहत कोई पहल करे, प्रांतीय विधान मंडल को इस मामले में अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रस्ताव पारित करने का अधिकार था। जैसा कि मैंने बताया