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पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन

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है कि धारा 290 में सुविचारित परिवर्तन किए गए हैं। वह गवर्नर जनरल से मौजूदा प्रांत से नया प्रांत बनाने का अधिकार ले लेती है। वह यह शक्ति भारत-सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) को देती है, वास्तव में ब्रिटिश मंत्रिमण्डल को। दूसरे, स्थानीय विधान मण्डल से पहल करने का अधिकार छीन लेती है। जैसा कि मुझे लगता है, धारा 290 के अंतर्गत नया प्रांत बनने के बारे में भारत-सचिव को पहल करने का अधिकार दिया गया है। एक बार जब भारत-सचिव नया प्रांत बनाने का फैसला कर लेता है, तो धारा 290 के अंतर्गत यह उसका दायित्व है कि ऑर्डर-इन-काउंसिल जारी करने से पहले उस आदेश से प्रभावित विधान मंडलों से परामर्श करे। तभी किसी प्रांतीय विधान मंडल के लिए इस तरह के प्रस्ताव के बारे में विचार-विमर्श करना उचित होगा, भले ही वह क्षेत्र उस प्रांत में न हो। मेरा निवेदन है कि अगर इस सदन के समक्ष यह प्रस्ताव ब्रिटिश सचिव द्वारा अग्रसारित किया गया है, तो मैं निवेदन करता हूं कि केवल तभी इस विधान मंडल के लिए यह विचार करना उचित होगा कि कर्नाटक को पृथक कर दिया जाए और कुछ क्षेत्र जो किसी और प्रांत के भाग हैं उन्हें इस प्रांत में सम्मिलित किया जाए या नहीं। तब तक यह कदम न उठाया जाए, जब तक कि मामला भारत-सचिव द्वारा न प्रस्तावित किया गया हो। मेरा निवेदन है कि हमारी प्रांतीय सरकार, यह प्रांतीय विधान मंडल उस प्रस्ताव पर विचार नहीं कर सकता जो स्पष्टतया ऐसी समस्या से संबंधित है, जो इस विधान मंडल व प्रांतीय सरकार के क्षेत्र व अधिकार से परे है। इसलिए मैं कहता हूं कि जो दृष्टिकोण आपने अपनाया है, वह नियमों के अनुसार और भारत अधिनियम की धारा 290 के तहत पूर्णतया उचित दृष्टिकोण है।

माननीय अध्यक्ष : मैं एक मुद्दा स्पष्ट कर देना चाहता हूं। जहां तक ‘मद्रास और कुर्ग’ शब्दों के समावेश का सवाल है, मैंने यह सुझाव नहीं माना। लगता है, माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर द्वारा पेश की गई दलील काफी आगे बढ़ गई है और कहती है कि नए प्रांत को बनाने से संबंधित या किसी प्रांत की सीमा को बदलने का कोई भी प्रस्ताव किसी भी प्रांतीय विधान मंडल में कतई नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि इस संबंध में कोई भी कदम उठाने का अधिकार विधान मंडल के पास नहीं है। जहां तक मुझे समझ आता है, उनकी दलील का यही मतलब है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : जी, महोदय।

माननीय अध्यक्ष : मद्रास और कुर्ग को समावेश करने के बीच उनकी नियमापत्ति में कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर किसी बात पर विचार भी नहीं किया जा सकता, तो मद्रास व कुर्ग के समावेश से कोई फर्क नहीं पड़ता। इनका मुद्दा उसकी तह तक जाता है। उस संबंध में एक कठिनाई है : पहल करने की शक्ति किन्हीं सीमाओं के अंतर्गत दी गई है, अथवा यों कहें कि इस शक्ति का पालन किन्हीं सीमाओं के भीतर करना होगा। लेकिन विधान मंडल इस दृष्टि से राय व्यक्त कर सकता है कि