204 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
वह सरकार से पहले मत व्यक्त करने का अनुरोध करे, जिसके पास पहल करने की शक्ति है। क्या धारा 290 में ऐसा कुछ है, जो विधान मंडल को पहल करने की प्रार्थना करने से रोकता है? यह कोई प्रस्ताव नहीं है, जिसके द्वारा वास्तविक पृथकता का निर्णय कर लिया गया हो। अगर ‘पहल’ शब्द का प्रयोग अन्य अर्थ में किया जा रहा है, तो उसका आरंभ प्रार्थना के द्वारा किया जा सकता है। लेकिन इस पर धारा 290 की शर्तों के अंतर्गत विधान मंडल पर क्या पहल की प्रार्थना करने पर भी रोक लगा दी गई है? इस मुद्दे पर मुझे खेद है कि मैं विद्वान डॉक्टर से सहमत नहीं हूं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मेरा यही दृष्टिकोण है कि इस सदन पर रोक लगा दी गई है। यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पहल करने की शक्ति भारत-सचिव को दी गई है और विधान-मंडल से पहल की शक्ति ले ली गई है और पुराने अधिनियम की धारा 52क की तुलना, वर्तमान अधिनियम की धारा 290 से करने से स्थिति पूर्णतया स्पष्ट हो जाती है। उस समय साइमन कमीशन और गोलमेज सम्मेलन द्वारा इस तथ्य पर विचार किया गया था और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जो प्रांत पृथक्करण की शर्तों को पूरी करते हैं, वे हैं उड़ीसा, सिंध और उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत। वे पहल करने की शक्ति प्रांतीय विधान मंडल को नहीं देते।
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर * (बंबई नगर) : अध्यक्ष महोदय! मैं अपने माननीय मित्र श्री जोग द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव का विरोध कर रहा हूं। निस्संदेह इस प्रस्ताव का विषय बहुत महत्त्वपूर्ण है। मैं नहीं जानता कि बहस के दौरान भावनाओं में बहे बिना और संवेदनशील हुए बिना इस सदन के कितने सदस्य इस प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार होंगे। मुझे लगता है, अनुचित जातियों का प्रतिनिधित्व करने के कारण मैं इस सदन के अन्य सदस्यों से ज्यादा लाभ की स्थिति में हूं। अगर मैं ऐसा कहता हूं तो यह आलंकारिक ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे न्यायसंगत भावना है। हम अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधियों को मराठी या गुजराती या कन्नड़ होने का कोई गर्व नहीं है। मैं कई कारणों से जिनमें मैं इस अवसर पर पड़ना नहीं चाहता, हम ऐसा सोचते हैं कि यह हमारी भूमि नहीं है। तथापि, मैं यह तर्क इसलिए दे रहा हूं कि इस प्रस्ताव द्वारा थोपी गई परिस्थितियों के बावजूद भी मैं तटस्थ दृष्टिकोण अपना सकता हूं या कम से कम तटस्थ दृष्टिकोण अपनाने की ओर गंभीर चेष्टा कर रहा हूं। महोदय! मैं चाहूंगा कि इस सदन के सदस्यों के लिए एक तथ्य दिमाग में रखना आवश्यक और वांछनीय होगा, जो मेरे ख्याल से बहुत महत्त्वपूर्ण है। अधिनियम लागू होने से पहले, बंबई प्रेसिडेंसी चार विभिन्न इकाइयों से बनी हुई थी — गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और सिंध। इस संयुक्त परिवार की बुनियाद नई नहीं है। कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात पिछले 115 वर्षों से इकट्ठे हैं। सिंध हमारे साथ करीब 90 वर्षों से था। सिंध