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पृथक कर्नाटक प्रांत का गठन

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को पृथक कर दिया गया है। यह विगत का विषय है, जिसको अब उखाड़ने की जरूरत नहीं। हम 115 वर्षों से इकट्ठे रह रहे हैं। मैंने इस वास्तविकता का उल्लेख इस तथ्य पर जोर देने के लिए किया है कि जो लोग इस एकता को समाप्त कर देना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि ये तीनों हिस्से जो जुड़े हुए हैं, अब उन्हें अलग कर दिया जाए। वे इस मामले पर केवल भावनाओं में न बहते हुए ज्यादा गंभीर ढंग से विचार करें।

मैं जिस पहले प्रश्न पर विचार करने की बात कर रहा हूं, वह यह है कि हमारे जिस मित्र ने यह प्रस्ताव रखा है, उसका कहना है कि यह प्रस्ताव समग्र प्रस्ताव का एक हिस्सा मात्र है। आदर्श तो यह होता कि कर्नाटक के सभी लोगों का एकीकरण किया जाए। यह प्रस्ताव उस दिशा में एक कदम मात्र है। महोदय! इस बारे में मैं प्रश्न पूछना चाहता हूं कि इस आदर्श को, अगर मेरे माननीय मित्र इसे स्वप्न कहने की अनुमति दें तो, क्या कन्नड़ बोलने वाले समस्त लोगों का एकत्र होने का स्वप्न साकार होना संभव है? मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह एक ऐसा स्वप्न है, जो कभी पूरा नहीं हो सकता, और मेरे यह कहने का कारण यह है : एक पुस्तक कर्नाटक के एकीकरण का मामला वितरित की गई, जिसकी एक प्रति मुझे भी मिल गई है। मैं इसे उस संस्था का प्रकाशन मानता हूं, जो इस प्रस्ताव के पीछे है। मुझे इस पुस्तक के पृष्ठ 22 पर एक वक्तव्य दिखाई दिया है, जिससे यह पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है कि कन्नड़ बोलने वाले भारत के कई राज्यों की सीमाओं में रहते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मैं अपने माननीय मित्रों से जो इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं, एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। वह है : क्या कन्नड़ बोलने वाले लोगों का देशी राज्यों के अधिकार क्षेत्र व प्रभुत्व से बाहर निकलना संभव है, ताकि वे कन्नड़ बोलने वाले स्वायत्तशासी प्रांत का हिस्सा बन सकें? मैं सहमत हूं और स्वीकार करता हूं कि ब्रिटिश भारत का प्रशासन मद्रास प्रेसिडेंसी या ब्रिटिश कानून के अधीन अन्य सरकारों को राजी कर लेगा कि कन्नड़ बोलने वाले लोगों के लिए अलग प्रांत बना दिया जाए, ताकि वे सब संयुक्त रूप से एक प्रशासन में समाहित हो सकें। पर मुझे समझ नहीं आता कि यह कैसे संभव है कि कन्नड़ बोलने वाले जो लोग देशी राज्यों में रह रहे हैं, उनकी निष्ठा को किसी भी ब्रिटिश भारत के प्रांत में स्थानांतरित कर दिया जाए। मुझे केवल एक स्थिति की संभावना नजर आती है, जिस पर विचार किया जा सकता है और वह यह है कि यदि देशी राज्यों के कन्नड़ भाषी प्रदेश ब्रिटिश भारत को दे दिए जाएं, तो बदले में ब्रिटिश भारत का कुछ प्रदेश राज्यों को दे दिया जाए। अब मैं सोचता हूं कि भारत सरकार अधिनियम से शासित क्या कोई भी समुदाय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में जाने को तैयार होगा, ताकि राज्य अपने अधिकार क्षेत्र के कन्नड़ बोलने वाले लोगों का स्थानांतरण करने को सहमत हो जाएं? मुझे कोई संभावना नजर नहीं आती, और इसलिए इस प्रस्ताव